मेरी मित्र भाषाविद पैगी मोहन भारत में अंग्रेजी भाषा के विस्तार की तुलना मोबाइल फोन से करती हैं। जिस तरह हमारी आम जनता लैंडलाइन का उपयोग करे बगैर मोबाइल फोन को अपना रही है, उसे देख उन्हें लगता है कि अंग्रेजी भाषा भी शायद इसी तरह विस्तार हासिल कर सके। इसी तरह वह प्रबुद्ध तबके की भाषा के दायरे से बाहर निकल आमजन की भाषा बन सकेगी। इसके बाद ही वह तेजी से बढ़ रहे विशालकाय मध्य वर्ग की दूसरी भाषा हो जाएगी। उन्हें लगता है कि मोबाइलधारी भारतीय इसके माध्यम से अपनी मातृभाषा से ऊपर उठ कामचलाऊ अंग्रेजी भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लेंगे।
शुरुआत में वे जो अंग्रेजी भाषा सीखेंगे या पढ़ेंगे वह उनके लिए विशेष दक्षता की तरह होगी, जिसके आधार पर वे रोजगार हासिल कर सकेंगे। हालांकि उस भाषा का संबंध शेक्सपियर संस्कृति से नहीं होगा, लेकिन वह भारत में लोकप्रिय हिंग्लिश संस्कृति के बहुत नजदीक होगी। यह वह संस्कृति है जिसे बॉलीवुड, एफएम रेडियो, एसएमएस और विज्ञापन ने प्रचार-प्रसार दिया है। जाहिर है अंग्रेजी शब्दों का अपनी मातृभाषा के साथ घालमेल कोई नया नहीं है।
यह सिलसिला तो पीढ़ियों से चला आ रहा है, लेकिन शुरुआत में यह निम्न वर्ग की सामाजिक स्तर पर ऊपर उठने की उत्कंठा से प्रेरित था। अब यह जरूर उच्च वर्ग के ड्राइंग रूम में बातचीत के लिए एक फैशनेबल माध्यम बन गया है। इस लिहाज से देखें तो भारतीय अंग्रेजी का स्वरूप बहुत लोकतांत्रिक है। यह विभिन्न वर्गो द्वारा समान रूप से अपनाई गई भाषा है। ऐसा ही कुछ-कुछ अन्य दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के साथ भी हो रहा है।
भारत का निम्न मध्यम वर्ग भारी कीमत चुकाकर अपने बच्चों को निजी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में पढ़ने के लिए भेजता है। पहले पहल उनके बच्चों को इन स्कूलों में झिझक सी महसूस होती है, लेकिन धीरे-धीरे इनमें से अधिकांश बच्चे इस नई द्विभाषी दुनिया में ठीक-ठाक कदम जमा ही लेते हैं। ऐसा इसलिए भी हो पाता है, क्योंकि बच्च पैदायशी द्विभाषी होता है। हमारे शैक्षिक प्रतिष्ठान ऐसे स्कूलों को सिरे से नकार देते हैं और कहते हैं कि या तो अभिभावक मूर्खता कर रहे हैं या वे स्कूलों के फरेब में फंस गए हैं।
यहां यह कतई न भूलें कि ये वही लोग हैं जिन्होंने बीते पचास वर्षो तक शुद्ध हिंदी की घुट्टी हमारे बच्चों के गले के नीचे ठूंस-ठूंसकर उतारी। इसके बदले इन्हें हासिल क्या हुआ? लाखों की संख्या में पढ़े-लिखे स्नातक बेरोजगार। अब कम से कम थोड़ी-बहुत अंग्रेजी सीखने के बाद ये बच्चे कोई रोजगार तो हासिल कर सकेंगे। इसे देख अब आप ही बताएं कि मूर्ख कौन है? यह पहलू हमारे शैक्षिक संस्थानों के लिए चेतावनी की घंटी है।
जब तक हम अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में पढ़ाने लायक व्यवस्थागत सुधार नहीं लाते, तब तक संभव है कि बच्चों को टेलीकॉम डिपार्टमेंट की लैंड लाइन सरीखा हश्र भुगतना पड़ेगा। हिंदी नेशनलिज्म पुस्तक के लेखक आलोक राय के मुताबिक शुद्ध हिंदी कभी भी आमजन की भाषा नहीं रही। 19 वीं सदी के मध्य में यह ब्राrाणों और कायस्थों के शक्ति संघर्ष से उपजी। दोनों ही के अपने-अपने स्कूल और लिपि थी-देवनागरी और कैथी। हालांकि 20वीं सदी में ब्राrाणों को जब तक विजय हासिल हुई तब तक अंग्रेजी प्रबुद्धजनों की भाषा बन चुकी थी।
स्वतंत्रता प्राप्ति के वक्त हिंदी वालों ने संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने के बहुतेरे प्रयास किए, लेकिन दक्षिण के विरोध के चलते वे नाकाम रहे। उन्होंने समझाने की कोशिश भी की कि शुद्ध हिंदी आमजनों की भाषा है, जो कि सरासर झूठ था। अगर उन्होंने हिंदी फिल्मों की लोकप्रिय हिंदुस्तानी भाषा को प्रोत्साहित करने का रास्ता चुना होता, तो संभवत: उन्हें अंग्रेजी को कड़ी चुनौती देने में सफलता मिल सकती थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी गलती से कोई सबक नहीं सीखा और इस कृत्रिम और भावहीन भाषा को पाठ्यक्रम की भाषा बनाए रखने पर जोर दिए रहे।
एक हद तक यह बात अन्य क्षेत्रीय भाषाओं पर भी लागू होती है। इन्हें भी रचा गया, ये मूलभाषा नहीं थीं। ये भी 19वीं सदी में अंग्रेजी भाषी मध्य वर्ग के उदय से प्रभावित हुईं। हम अपने बच्चों को जो हिंदी सिखा पढ़ा रहे हैं, वह आमजन से जुड़ने की बजाय उनसे कटती है। विज्ञान की किताब को हिंदी में पढ़ना कितना असहज लगेगा। वास्तविक विज्ञानी संस्कृतनिष्ठ शब्दों का इस्तेमाल कतई नहीं करते हैं। भले ही वह उस वक्त हिंदी में ही क्यों नहीं बोल रहे हों। यह एक काल्पनिक दुनिया है जिसका माध्यम वास्तविक दुनिया में जरा भी काम नहीं आता।
यही वजह है कि एक महत्वाकांक्षी विद्यार्थी एक समय इससे किनारा कर अंग्रेजी का दामन थाम लेता है। इसे समझते हुए हिंग्लिश के खिलाफ संघर्ष छेड़ने से बेहतर होगा कि हमारे शिक्षाविद नैसर्गिक रूप से द्विभाषी बच्चों को मानक अंग्रेजी अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के साथ बेहद जीवंत और प्रासंगिक ढंग से पढ़ाएं। इस बाबत हुए अध्ययन भी बताते हैं कि यदि बच्च दस वर्ष की उम्र तक दोनों भाषा सीख लेता है तो यह उसके आगे की जिंदगी के लिए फायदेमंद साबित होता है।