विकास मंत्र. एक टेलीविजन कार्यक्रम में अतिथि के रूप में एक बुजुर्ग आदमी आया। वह बहुत दुर्लभ शख्स था, जिसने अपनी सारी बातें बगैर किसी रिहर्सल के कीं। उसका व्यक्तित्व खुशनुमा और प्रफुल्लित था। उसकी बातें उसके व्यक्तित्व से सहज रूप से बाहर निकल रही थीं। जब भी वह कुछ कहता था तो यह इतना सहज और सटीक होता था कि कार्यक्रम देखने वाले लोग हंसी के मारे दोहरे हो रहे थे। वे उसे पसंद कर रहे थे। टेलीविजन की हस्ती पर भी प्रभाव पड़ा और वह भी दूसरों के साथ उसकी बातों का आनंद ले रहा था।
आखिर में उसने उस बुजुर्ग आदमी से पूछ ही लिया कि वह इतना खुश क्यों है? बुजुर्ग ने जवाब दिया, ‘कुछ नहीं। मेरी खुशी का कोई बहुत बड़ा राज नहीं है। यह तो उतना ही सीधा है, जितना आपके चेहरे पर लगी नाक। जब मैं सुबह उठता हूं तो मेरे पास दो विकल्प होते हैं-या तो मैं खुश रहूं या फिर दुखी। आपको क्या लगता है कि मैं कौन सा विकल्प चुनता हूं? मैं सिर्फ खुश रहने का विकल्प चुनता हूं और यही मेरी खुशी का राज है।’
यह बहुत साधारण और सतही सी बात लगती है, परंतु अब्राहम लिंकन भी कहते थे, ‘लोग उतने ही खुश रहते हैं, जितने खुश रहने का विकल्प वे चुनते हैं। अगर आप दुखी रहना चाहते हैं तो आप बड़े आराम से दुखी रह सकते हैं। यह दुनिया का सबसे आसान काम है। सिर्फ दुखी रहने का विकल्प चुन लें। अगर आप सुखी रहने का विकल्प चुनते हैं तो आप सचमुच सुखी हो जाएंगे।’ बड़े लोगों की तुलना में बच्चे खुशी के ज्यादा बड़े विशेषज्ञ होते हैं। वह वयस्कजो अपने दिल में अधेड़ावस्था या वृद्धावस्था में भी बचपन को बनाए रखता है, वह एक जीनियस होता है। वह उस वय में भी खुश रह सकता है।