दृष्टिकोण. आम चुनावों का समय नजदीक आ रहा है। ऐसे में एक ऐसी राजकोषीय नीति बनाना जरूरत से ज्यादा राजनीतिक मजबूरी लगती है जो सार्वजनिक निवेशों का रुख बदहाल कृषि सेक्टर की ओर मोड़ सके। दुर्भाग्य यह है कि बीते बरसों के दौरान देश में कृषि की उपेक्षा करने और बड़े-बड़े कारोबारों को दुलारते हुए और अमीर बनाने का गेम प्लान चलता रहा। कोई भी आम बजट वित्त मंत्री द्वारा देश को यह स्मरण दिलाए बिना पूरा नहीं हो सकता कि उसके बजट में कृषि संकट को हल करने के लिए कितना व्यापक प्रबंध किया गया है।
खेती को संकट से उबारने के इन सब प्रयासों के बावजूद आम बजट सही मायनों में अमीरों के लिए ही आनंद का सबब बनते आए हैं। जैसा कि वरिष्ठ अर्थशास्त्री कमल नयन काबरा कहते भी हैं- ‘वस्तुत:, सरकार द्वारा जो कारपोरेट इनकम टैक्स में रियायतें दी जाती हैं, वह उस कुल रकम से थोड़ा ही कम है, जो केंद्र और २८ राज्य सरकारें मिलकर समस्त ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए खर्च करती हैं।’ २क्क्४-क्५ में अनेक कर रियायतों, छूट और प्रोत्साहन, कुल उत्पाद, चुंगी और व्यक्तिगत आयकर तथा कारपोरेट आयकर राहतों के चलते २.क्६ लाख करोड़ रुपए का राजस्व घाटा हुआ। २क्क्५-क्६ में इन्हीं छूटों के चलते यही घाटा बढ़कर २.३५ लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया।
देश के अलग-अलग हिस्सों में कर्ज के जाल में फंसे किसानों और उनके द्वारा इस फेर में की जा रही आत्महत्याओं की लगातार आती खबरों के बावजूद ऋण के बोझ तले दबे किसानों के लिए वित्त मंत्री यह घोषणा करते हुए फूले नहीं समाएंगे कि उन्होंने वित्तीय वर्ष २क्क्७-क्८ में किसानों को २.२५ लाख करोड़ रुपए ऋण बांटने के लक्ष्य को पा लिया है। विडंबना यह है कि यह राशि बीते वर्ष में हुए २.३५ लाख करोड़ रुपए के घाटे से कहीं कम है, जो हमें भारतीय उपक्रमों को करों में रियायतें देने के चलते हुआ।
यह अजीब अर्थशास्त्र ही कहा जाएगा, जहां लाखों किसानों पर यह मेहरबानी(उधार के जरिए) की जा रही है, वहीं कुछ सैकड़ा अमीर प्रत्यक्ष आय के रूप में इतनी ही राशि पा रहे हैं(कर रियायतों के जरिए पैसा बचाना भी तो एक तरह से पैसा कमाना ही है)। आखिर हम उद्योगों से अधिक उधार उठाने के लिए क्यों नहीं कह सकते ताकि प्रत्यक्ष आय किसानों के लिए हो जाए? अर्थशास्त्री ऐसे किसानों को और उधार देने को कैसे तर्कसंगत ठहरा सकते हैं, जो पहले ही ऋण के बोझ तले दबे हैं और इसे चुकाने में असमर्थ हैं? आखिर हमारे वित्त मंत्री इन किसानों को ऋण के जाल से बाहर निकालने और उन्हें सतत और सुनिश्चित मासिक आय मुहैया कराने का ईमानदार प्रयास क्यांे नहीं कर सकते, जिसकी आज कहीं ज्यादा जरूरत है?
इस दिशा में पहला कदम तो यह हो सकता है कि ऐसे छोटे और हाशिए पर पड़े किसानों, जिनके पास सिंचित इलाके में पांच एकड़ से कम या गैर-सिंचित इलाके में २क् एकड़ से कम जमीन है, की बकाया ऋण राशि माफ कर दी जाए। वैसे भी पहले ही ६५,क्क्क् करोड़ रुपए के कर्ज माफ करने की बातचीत चल रही है, जिसमें वह २५,क्क्क् करोड़ भी शामिल हैं, जिसे राष्ट्रीयकृत बैंकों ने गैर-निष्पादनीय संपत्तियों में डाल रखा है।
फार्म सेक्टर को साल-दर-साल कुल मिलाकर जितना घाटा होता चला आ रहा है, वह इस रकम से कहीं ज्यादा है। इसे देखते हुए ऐसे डूबे कर्जो को तुरंत ही खत्म करने की जरूरत है, ताकि कर्ज के बोझ तले किसानों को नया जीवन मिल सके। वास्तव में संप्रग सरकार को यह काम तभी कर लेना चाहिए था, जब वह मई २क्क्४ में सत्ता में आई थी।
इसके साथ-साथ सभी जगह कृषि ऋणों की ब्याज दर घटाकर ४ फीसदी कर देनी चाहिए, जैसा कि चीन में है। इसके अलावा जो काम ज्यादा जरूरी है और जिसके लिए राजस्व लागत भी नहीं आएगी, वह यह कि ब्रिटिश राज के दौरान बनाए गए निर्मम कानूनों को खत्म कर दिया जाए। गौरतलब है कि १९क्४-१२ के दौरान अंग्रेजों के एक पब्लिक डिमांड रिकवरी एक्ट के तहत किसानों को मामूली बकाया राशि न चुकाने पर भी जेल भेजा जा सकता था। इतना ही नहीं, जेल के खर्चे भी किसान को ही उठाने पड़ते थे। आज भी कृषि ऋणों की वसूली के लिए बैंक ऐसे ही प्रावधानों का इस्तेमाल करते हैं।
बुरे कर्जो से मुक्ति पाने के लिए ऐसी नई फार्म पॉलिसी जरूरी है, जो इस सतत चली आ रही प्रक्रिया के खिलाफ गारंटी प्रदान करे। जब तक सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन और राष्ट्रीय विकास परिषद की अनुशंसाओं के आधार पर बनाए गए २५,क्क्क् करोड़ के फंड को राष्ट्रव्यापी लो एक्सटर्नल इनपुट सस्टेनेबल एग्रीकल्चर(एलईआईएसए) प्रोग्राम की ओर मोड़ा जाना सुनिश्चित नहीं करती, तब तक किसानों के लगातार ऋण लेने और बाद में उन्हें माफ करने का यह चक्र चलता रहेगा।
उर्वरक सब्सिडी के मौजूदा तंत्र को प्रतिस्थापित करना, जिसके जरिए सरकार उद्योगों के उत्पादन खर्चो का भुगतान करती है, एक अच्छी पहल है। फर्टिलाइजर सब्सिडी की यह रकम, जिसके निकट भविष्य में ५क्,क्क्क् करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है, इसकी बजाय सीधे किसानों को दी जानी चाहिए। अब तक तो इसके क्रियान्वयन में राजनीतिक एकराय कायम न हो पाना बाधक बन रहा है।
किसानों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जाए कि वे इस रकम का इस्तेमाल कार्बनिक खेती में करें। ऐसी पहल से उत्पादन के खर्च में काफी कमी आएगी, मिट्टी को पुनर्जीवन मिलेगा, किसानों की आय बढ़ेगी और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी घटेगा।
-लेखक खाद्य एवं व्यापार नीति विश्लेषक हैं।