संपादकीय. पाकिस्तान में राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के विरोधी दो राजनीतिक दलों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी(पीपीपी) व पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज(पीएमएल-एन) द्वारा सरकार बनाने के फैसले को जनादेश के अनुरूप ही माना जाएगा। पीपीपी के सहअध्यक्ष आसिफ जरदारी और पीएमएल-एन के नेता नवाज शरीफ के बीच सरकार गठन की सहमति से पाक में लोकतंत्र समर्थकों को खासी तसल्ली हुई होगी।
चुनाव परिणाम आते ही पीपीपी के आसिफ जरदारी ने मुशर्रफ के साथ किसी गठबंधन से इंकार कर दिया था, लेकिन मुशर्रफ के निकटस्थ तारिक अजीज से उनकी मुलाकात के बाद यह अटकलें लगने लगी थीं कि अमेरिकी पहल के चलते वे मुशर्रफ से सत्ता के लिए हाथ मिला सकते हैं। अब यह कयास खारिज हो चुका है और जरदारी ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चुनाव में मुशर्रफ का साथ देने वाले दल इस गठबंधन में शामिल नहीं किए जाएंगे।
सरकार बनाने के लिए दोनों दलों के बीच हुई यह सहमति फौरी तौर पर लिया गया सैद्धांतिक फैसला है तथा इस पर अमल की प्रक्रिया अभी तय होनी है। राह आसान न हो तब भी संभावना यही दिखती है कि मुशर्रफ विरोधी दलों की एकजुटता पाकिस्तान की सियासी फिजा को नया रंगरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। जरदारी व शरीफ की पार्टियों की राहें वैसे तो जुदा ही रही हैं लेकिन मुशर्रफ की तानाशाही के दोनों ही शिकार रहे हैं।
बेनजीर भुट्टो की हत्या ने दोनों दलों को करीब लाने के सूरत-ए-हाल हाल पैदा किए और पाकिस्तान के अवाम ने मुशर्रफ को खारिज करते हुए यह फैसला दिया कि दोनों दल मिलकर देश और अवाम की नई तकदीर लिखें। मुशर्रफ की सत्ता को नेस्तनाबूद करते हुए नई हुकूमत कायम करने की राह में आने वाली मुश्किलात को हल करने में दोनों दलों का गठबंधन उम्मीदें तो जगाता है लेकिन उनकी राहें बहुत आसान नहीं होंगी।
सबसे बड़ी अड़चन दोनों दलों की सोच और एप्रोच में एकरूपता लाने की होगी। साझा कार्यक्रमों पर सहमति बहुत टिकाऊ नहीं होती, तिस पर मुशर्रफ और अमेरिकी हस्तक्षेप का समां जल्दी हटने वाला नहीं है। सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर अहं और हक की लड़ाई का शिकार होने से दोनों दलों को बचना होगा। सैनिक तानाशाही को लोकतंत्र में तब्दील करने की प्रक्रिया बेहद जद्दोजहद भरी हो सकती है। फिर भी यह उम्मीद करने के पर्याप्त कारण हैं कि पाकिस्तान का अवाम खुली हवा में सांस लेने की ओर आगे बढ़ सकता है।