प्रदेश के आने वाले बजट से इस बार लोग भयभीत होने के स्थान पर उसकी आतुरता से प्रतीक्षा कर रहे हैं, क्योंकि इस सरकार का यह आखिरी बजट है और चुनाव होने वाले हैं। अत: सभी मानते हैं कि इस बार सौगातों की भरमार होगी और कोई नया बोझ नहीं डाला जाएगा, पर इस बार कम से कम दो खतरे अवश्य हैं- एक तो उन सभी लोगों को जो प्रोफेशनल टैक्स देते हैं, क्योंकि इस बार राज्यों के अनुरोध पर केंद्र सरकार इसकी सीमा 2500 रु. से बढ़कर 5000 करने जा रही है और तब राज्य सरकार इसका फायदा उठा सकती है। दूसरे राज्यों के कहने पर ही केंद्र सरकार अगर कुछ मदों पर राज्यों को सेवा कर लगाने की अनुमति दे देती है, तो कुछ नया भार जनता पर डाला जा सकेगा। हालांकि शायद यह बजट के बाद कभी हो।
यह बजट सरकार और वित्त मंत्री को बहुत अवसर प्रदान करता है कि वे अपनी योजनाओं की मंशा और उपकृत करने की नीति को दर्शाकर लोगों को लुभा सकें जिसका कुछ राजनीतिक लाभ मिल सके। अब राजनीतिक रूप से कुछ भी कहा जाए यह सब जानते हैं कि राज्य अभी भी पिछड़ा है और तमाम प्रयासों के बावजूद राज्य का सकल घरेलू उत्पाद राष्ट्रीय औसत के समकक्ष नहीं बढ़ पाया।
वर्ष 2001-02 से 2005-06 के बीच औसत वृद्धि दर 4.24 प्रतिशत की रही और अभी भी हमारी प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का दो तिहाई मात्र है और दोनों के बीच अंतर घटने की बजाय बढ़ता जा रहा है। विकास के मानदंडों पर प्रदेश राज्यों में 11 से 13वें के बीच ही आता है। आर्थिक और सामाजिक अधोसंरचनाओं की कमी के कारण यह स्थिति वर्र्षो से जारी है। केंद्र ने राज्य के 45 में से 24 जिलों को पिछड़ा घोषित किया है, जिसके लिए वह विशेष सहायता प्रदान करेगा। सरकार की कोशिश होगी कि वह सिद्ध कर सके कि राज्य इन पांच वर्र्षो में पिछड़ेपन से उबर गया।
एक अच्छी बात यह है कि इस सरकार का वित्तीय प्रबंधन संतोषप्रद रहा। जिस कारण पिछले कुछ वर्र्षो में घाटा घटा और 2004-05 से रेवेन्यू आधिक्य रहा। सरकार को न तो रिजर्व बैंक से ओवरड्राफ्ट लेना पड़ रहा है और न ही वेज और मीन्स के लिए अग्रिम, पर इसके बावजूद 2006-07 वर्ष में विकास व्यय अपने पूर्ववर्ती वर्ष से मात्र 0.4 प्रतिशत ही अधिक था। हालांकि वर्तमान वर्ष में यह 9.8 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमानित है। इस वर्ष इसमें 10 प्रतिशत की वृद्धि किए जाने की आवश्यकता है और उम्मीद भी।
सरकार इससे भलीभांति अवगत है कि पिछले चुनावों में जीत में सड़क, बिजली और पानी का बड़ा योगदान रहा है, इसलिए उसकी प्राथमिकताएं तो तय ही थीं। इस दिशा में काफी प्रयास भी हुए हैं और तीनों मामलों में प्रगति हुई है। यह बात और है कि अभी भी ये प्राथमिकताएं यथावत बनी हुई हैं। पर चूंकि राज्य के पिछड़ेपन के लिए आर्थिक अधोसंरचना और सामाजिक सेवाओं की कमी जिम्मेदार है। अत: उन सभी पर ध्यान देने की जरूरत है। प्रदेश की अर्थव्यवस्था अभी भी कृषि प्रधान है। चूंकि सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 30 प्रतिशत योगदान कृषि का ही है, जो कि अधिकांशत: मानसून पर निर्भर है और मात्र 30 प्रतिशत ही सिंचित क्षेत्र है। अत: इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वर्ष 2005-06 में हमारा खाद्य उत्पादन 3.15 प्रतिशत घट गया था और देश के उत्पादन में हमारा हिस्सा बहुत कम है। हाल ही के किसान महापंचायत में मुख्यमंत्री ने किसानों के लिए तमाम घोषणाएं कीं, जिनमें सस्ते ऋण, बिजली बिल, कुछ माफी आदि बातें शामिल हैं। जिन पर लगभग 5600 करोड़ रु. का भार आएगा, यानी ये सब इस बजट में शामिल होंगे। उल्लेखनीय है कि प्रदेश का भू-जल स्तर गिरता जा रहा है और नदियों के जल का मात्र हम 20 प्रतिशत ही उपयोग में ला पा रहे हैं, जबकि पड़ोसी राज्य लगभग 83 प्रतिशत तक। जरूरी है कि इस सतही जल का 50 प्रतिशत उपयोग में लाया जा सके, ताकि कृषि उद्योग और पीने के पानी की व्यवस्था हो सके। बजट में यह परिलक्षित होना चाहिए। ग्लोबल इन्वेस्टर मीट के बाद उद्योगों को काफी उम्मीदें हैं, देखना है कि कितनी पूरी होती हैं।
सामाजिक सेवाओं में शिक्षा-स्वास्थ्य प्रदेश में चिंताजनक स्थिति में हैं। शिशु मृत्युदर के मामले में राज्य अभी भी सबसे आगे है। मातृत्व मृत्युदर 498 के स्तर पर बहुत ऊंची है। कुपोषण में मप्र दूसरे स्थान पर है यानी हालत बहुत ही गंभीर है। पूर्व के वर्र्षो में सामाजिक सेवाओं को बजट में काफी नजरअंदाज किया गया है। हालांकि 2004-05 में मात्र 24 प्रतिशत, पर औसतन 2000-01 और 2007-08 के बीच औसत वृद्धि दर मात्र 8.1 प्रतिशत रही, जबकि पिछले दशक में यह 20.4 प्रतिशत थी।
इस बजट से लोगों के जीवन और जीवन की गुणवत्ता पर चिंता का संदेश अवश्य आना चाहिए। बजट लोक-लुभावन होगा इसलिए कर्मचारियों को वेतनमान व कल्याण के प्रावधान, महिलाओं और बच्चों के लिए अलग से योजना, पिछड़े वर्र्गो और नगरीय जनसंख्या के लिए कुछ विशेष प्रावधान, पुलिस और डॉक्टरों के लिए कुछ पैकेज दिए जाने की संभावना है। देखना यह है कि बजट कितना उदार होता है।
-लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।