विकास मंत्र. देश के प्रमुख महानगरों की सड़कों पर यातायात बढ़ने के साथ ट्रैफिक लाइटों पर इंतजार की अवधि भी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। उत्पाद बेचने का यह अद्भुत अवसर है। इसीलिए पिछले कुछ सालों में स्ट्रीट सेलिंग या नुक्कड़ बिक्री में भारी इजाफा हुआ है। ग्रीन लाइट होने की प्रतीक्षा में ठहरे और ऊबे उपभोक्ता तक पहुंचकर उत्पाद बेचने का यह अवसर उद्यमियों ने पहचान लिया है।
स्टीयरिंग व्हील के पीछे बैठा आदमी फुरसत में इधर-उधर ताक रहा है। यही समय है जब पत्रिका, किताब, ताजे फूल, लॉटरी टिकट या बीवी के लिए वेणी लेकर पहुंच जाओ। यानी ऐसे उत्पाद जिनके लिए ज्यादा जेब भी ढीली न करनी पड़े और जिन्हें खरीदने का फैसला एक झटके में किया जाता है।
स्ट्रीट सेलिंग में लगे लोगों ने नई रणनीतियां विकसित कर ली हैं। इनमें से कुछ को तो कुछ निश्चित चीजें बेचने में महारत हासिल है। कुछ सिर्फ फ्री-एड्स और एड-मैग किस्म के प्रकाशन ही बेचते हैं। दूसरों के पास तमाम उत्पाद हैं-नवीनतम पैपरबैक, केनेथ स्टार की ताजा रिपोर्ट, ग्लॉसी पत्रिकाएं, लोक सेवा परीक्षा का फॉर्म या नए शेयरों के आवेदन पत्र। यही नहीं, ट्रैफिक लाइटों पर आपको फकत 350 रुपए में रे-बेन का चश्मा मिल सकता है या इसी तरह औने-पौने दाम में महंगी फेस क्रीम और परफ्यूम, जिन्हें असली बताकर बेचा जाता है।
रेड लाइटों पर नुक्कड़ बिक्री अब परवान चढ़ चुकी है। आश्चर्य नहीं कि जल्दी ही यहां अंडे बेचे जाने लगें। चतुर स्ट्रीट सेलर की निगाह आप पर है। आपकी जरूरत की हर तार्किक चीज वह रेड लाइटों पर ले आएगा। आप व्यस्त नौकरीपेशा हैं और चाहते हैं कि घर लौटते वक्त अंडा और ब्रेड आपको चौराहों पर मिल जाए, तो वह मिल जाएगा। आखिर इन रेड लाइटों पर आप इतना सारा वक्त जो बिताते हैं।
-लेखक प्रख्यात मैनेजमेंट कंसलटेंट हैं।