दृष्टिकोण. प्रोजेक्ट टाइगर, जिसका नेतृत्व कभी कैलाश संखला जैसे काबिल और साहसी लोगों ने किया था, आज नेतृत्व के संकट से गुजर रहा है। हालिया खबर यह है कि बाघों की संख्या तेजी से कम हो रही है। वर्ष १९७३ में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के समय जितने बाघ थे, हमारे यहां आज उससे भी कम बाघ बचे हैं। यह उन सब लोगों के लिए गहरी शर्मिदगी का विषय है, जिन पर बाघों को बचाए रखने की जिम्मेदारी है। इसमें प्रधानमंत्री समेत उन राज्यों के मुख्यमंत्री भी शामिल हैं, जहां बाघ पाए जाते हैं। बाघों को बचाने में नाकाम रहने की वजह से आने वाली पीढ़ियों द्वारा संरक्षणवादियों समेत इस काम में लगी बड़ी-बड़ी स्वयंसेवी संस्थाओं को भी कोसा जाएगा। सचाई यह है कि पूरा भारत ही बाघों को बचाने में असफल रहा है।
सवाल यह है कि आखिर बाघों के लिए परिस्थितियां अचानक बदल कैसे गईं? यह सब अचानक नहीं हुआ। वर्ष १९९क् से बाघों की संख्या धीरे-धीरे घटती जा रही है। आज देश में १५क्क् से भी कम जीवित बाघ बचे हैं। इसका मतलब है कि हमने पिछले पांच बरस के दौरान २३क्क् से ज्यादा बाघ गंवा दिए। भले ही वर्ष २क्क्क् के आसपास बाघों की संख्या ३५क्क् से कम रही हो, क्योंकि वन अधिकारियों के इस संदर्भ में अलग-अलग आंकड़े रहे हैं। फिर भी सच यही है कि आज के आंकड़े भयावह रूप से कम हैं।
अब सवाल यह है कि हमारे बाघों को मार कौन रहा है? निस्संदेह अवैध रूप से शिकार करने वाले। लेकिन जो बड़ी-बड़ी कंपनियां बाघों के आवास यानी जंगलों में बांध बना रही हैं, उत्खनन कर रही हैं और अपने लाभ के लिए पेड़ों को काट-काटकर बेच रहीं हैं, वे भी इसके लिए समान रूप से दोषी हैं। सचाई तो यही है कि जंगलों को खत्म करने से निश्चित तौर पर बाघों का हमेशा के लिए सफाया हो जाएगा।
इन अवैध शिकारियों को बाघ, हाथी, गैंडा समेत उन समस्त प्रजातियों के जीवों को मारने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर के अपराध सरगनाओं और गैंगों द्वारा वित्तीय मदद मिलती है, जिनकी बाजार में काफी कीमत है। यहां तक कि सुविख्यात काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान भी इससे अछूता नहीं है। यहां भी वर्ष २क्क्७ के दौरान २क् से अधिक गैंडों को मारा जा चुका है।
वर्ष १९७३ में जब देश में १७क्क् से थोड़े ज्यादा बाघ होने का अनुमान लगाया गया था, पूरी दुनिया ने कहा था कि बाघ बेहद खतरे में हैं और इसके बाद प्रोजेक्ट टाइगर लांच किया गया। नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी की नई रिपोर्ट बताती है कि जिम कॉर्बेट, काजीरंगा, नागरहोल, कान्हा और तडोबा जैसे टाइगर रिजव्र्स में तो बाघ सुरक्षित हैं, लेकिन ऐसे सुरक्षित अभयारण्य से बाहर और ऐसे जंगलों में, जहां अभी भी मानव आबादी है, बाघ तकरीबन खत्म हो चुके हैं या जल्द ही खत्म कर दिए जाएंगे। सत्य यह है कि बाघ ऐसे रिजव्र्स में ज्यादा सुरक्षित हैं जहां इंसानी आबादी नहीं है या बहुत कम है।
दूसरी तरफ पलामाउ और नम्दाफा जैसी जगहों पर उनका सफाया हो चुका है। वर्ष २क्क्४ में सरिस्का ने अपने सारे बाघ खो दिए थे। पन्ना में वर्ष २क्क्२ के बाद से बाघ के किसी नन्हे शावक ने जन्म नहीं लिया और ५क् फीसदी से ज्यादा पार्क में तो लगता है, बाघ बचे ही नहीं हैं। पहले एक प्रजनन योग्य बाघिन नजर आई भी, लेकिन २क्क्७ के मध्य से वह भी लापता है। बीते वर्ष के आखिर में मध्यप्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में जानवरों को फंसाने के जाल और फंदे पाए गए, जबकि इस क्षेत्र के बारे में माना जाता है कि बाघ यहां पूरी तरह सुरक्षित हैं।
यहां से बाघ की खालें लगातार चीन, जापान और हांग-कांग समेत सुदूर-पूर्वी देशों को भेजी जाती हैं। अब रिपोर्ट कहती है कि आज हमारे पास १५क्क् से भी कम जीवित बाघ बचे हैं। देखा जाए तो देश के तकरीबन सभी वनों पर खतरा मंडरा रहा है। खेती, पशुओं के चारे और बांध, कोयले की खदानें, फोर-लेन हाईवे, थर्मल प्लांट्स, सीमेंट के कारखाने, स्टील प्लांट्स, बंदरगाह और यहां तक कि नाभिकीय रिएक्टर के लिए जंगलों को काटा जा रहा है।
जो लोग वास्तव में वन्यजीवों का हित चाहते हैं, वे इतने सशक्त नहीं हैं कि बाघों को बचा सकें और जिनके हाथों में हमने बाघों की सुरक्षा सौंप रखी है, उन्हें लगता है इनकी कोई परवाह ही नहीं है। वन और वन्यजीवों की रक्षा के लिए जो फॉरेस्ट राइट्स एक्ट बनाया गया, इसके चलते लोगों ने जंगलों में घुसपैठ करना और जमीन हथियाने के लिए पेड़ों को काटना शुरू कर दिया है। इसके परिणामस्वरूप न सिर्फ बाघ और दूसरे वन्यजीवों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा, वरन हमारी जलवायु विषमता की समस्या और विकट हो जाएगी।
भारत द्वारा छोड़ी गई समस्त ग्रीनहाउस गैसों में से एक-चौथाई के लिए जंगलों की कटाई जिम्मेदार है। भविष्य में यह स्थिति और बिगड़ जाएगी। एक अनुमान के मुताबिक हम 7.5 गीगाटन कार्बन डाइ ऑक्साइड उत्सर्जित करने लगेंगे। इससे हमारी नदियां और झीलें भी प्रभावित होंगी और परिणामस्वरूप खेती पर भी प्रभाव पड़ेगा। दुखद बात यह है कि इस हालिया कानून के तहत जब कोई जमीन स्थानीय समुदायों को दी जाएगी, तो इसे तुरंत बेच दिया जाएगा या छीन लिया जाएगा और वे गरीब पहले की ही तरह गरीब रह जाएंगे। ऐसे में फॉरेस्ट राइट्स एक्ट न तो जंगल में रहने वाले लोगों के लिए मददगार साबित होगा और न ही वन्यजीवों के लिए।
विडंबना यह है कि वन एवं पर्यावरण मंत्रालय अपने मूल मकसद से हटकर ऐसे राजनेताओं के हाथोंे की कठपुतली बन गया है जो ‘येन-केन-प्रकारेण’ मंत्रालय को अति विध्वंसात्मक औद्योगिक परियोजनाओं पर मंजूरी देने के लिए राजी कर लेते हैं। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा ४९ औद्योगिक परियोजनाओं, जिनमें उत्खनन, सिंचाई और पवनचक्की जैसी परियोजनाएं भी शामिल हैं, की मंजूरी के चलते १५ हजार हेक्टेयर से ज्यादा जंगलों का खात्मा हो गया है।
इसका मतलब है कि तकरीबन तीस लाख पेड़ इसकी बलि चढ़ गए। इसके अलावा राज्य और केंद्र सरकार की ऐसी परियोजनाओं के लिए भी लाखों पेड़ काटे जा रहे हैं, जिनके लिए चालीस हेक्टेयर या इससे कम जमीन की जरूरत है। इस समस्या से निपटने के लिए हमें भी आगे आना होगा। बाघों को मदद की तुरंत आवश्यकता है। हम प्रधानमंत्री से इस संदर्भ में अब और कोई वादे-घोषणाएं नहीं सुनना चाहते। हमें पुख्ता और त्वरित कार्रवाई की अपेक्षा है।