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परमाणु करार पर नई सरगर्मी

संपादकीय. अगर बजट सत्र के पहले दिन संसद में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील के अभिभाषण और पिछले दिनों के घटनाक्रम को आधार बनाया जाए, तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मनमोहन सरकार परमाणु करार को लेकर एक निश्चित दिशा में बढ़ रही है। राष्ट्रपति के संबोधन के अलावा पिछले दिनों इस बात के कई अन्य संकेत भी मिले हैं। अमेरिका में भारत के राजदूत रोनेन सेन को एक साल का सेवा विस्तार मिलना, प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार श्याम सरन द्वारा परमाणु जरूरतों के लिए इस करार की जमकर वकालत की जाना और सबसे महत्वपूर्ण अमेरिकी सीनेट के तीन प्रभावशाली सीनेटरों के दल का दिल्ली आना कुछ ऐसे ही संकेत हैं।

सीनेट के इस दल ने न सिर्फ प्रधानमंत्री से मुलाकात की, बल्कि बाद में सार्वजनिक रूप से करार पर प्रधानमंत्री का सकारात्मक रुख जाहिर करने में भी संकोच नहीं किया। इनके अलावा म्युनिख में प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अध्यक्ष अलबरदेई की मुलाकात और उससे निकलने वाले अन्य संकेतों को समझा जाए, तो काफी कुछ स्पष्ट हो जाता है।

उधर, देश के परमाणु ऊर्जा विभाग और विदेश मंत्रालय का संयुक्त प्रतिनिधि मंडल विएना में भारत-केंद्रित परमाणु हितों को लेकर सौदेबाजी में व्यस्त है, जिसे भी महज संयोग नहीं माना जा सकता। यह बातचीत और सौदेबाजी अभी पूरे हफ्ते चलनी है। यदि सब कुछ ठीक रहा, तो संभव है कि ऊर्जा आपूर्ति वगरह को लेकर भारत की चिंताएं और आशंकाएं दूर हो जाएं।

ऐसा लग रहा है कि इस सारी कवायद के पीछे सरकार की कोशिश मार्च तक अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से संबंधित सभी मुद्दों का निराकरण करने की है, ताकि अप्रैल-मई में समझौते का मसौदा अमेरिकी कांग्रेस तक पहुंचा दिया जाए अन्यथा बुश प्रशासन अपनी सीनेट और कांग्रेस से इसे पारित नहीं करवा पाएगा।

उस स्थिति में शायद यह डील खटाई में पड़ जाए। पूरी संभावना है कि चुनाव के बाद अमेरिकी प्रशासन में डेमोक्रेट्स आ जाएं। उनकी सोच इस मामले में थोड़ी भिन्न है। इसलिए यदि करार होना है तो बुश प्रशासन के समय में ही हो सकता है अन्यथा तकनीकी और कानूनी झंझावातों में फंसकर यह अपने मौजूदा रूप में तो पारित नहीं हो पाएगा। ऐसे में करार को लेकर सरकार की सरगर्मी समझी जा सकती है।





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