इंदौर. पैरों पर खड़े होने की ललक ऐसी जागी कि पूरे स्कूल की छात्राओं ने पढ़ाई के साथ खुद का कारोबार भी स्थापित कर लिया। पढ़ाई का खर्च तो उठा ही रही हैं, कुछ के अधीन चार-पांच महिलाएं भी काम करने लगी हैं। छात्राएं उत्पादन से लेकर मार्केटिंग तक खुद ही कर रही हैं। यह मिसाल पेश की शासकीय अहिल्याश्रम क्रमांक-2 के मिडिल स्कूल की छात्राओं ने।
सरकारी स्कूल की छात्राओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पढ़ाई के साथ विशेषज्ञों की मदद से कई काम सिखाए जा रहे हैं। इसके लिए जिले के 48 स्कू लों को मॉडल क्लस्टर शालाओं के रूप में विकसित किया गया है। इसमें से कुछ स्कूल की छात्राओं ने प्रशिक्षण लेकर स्वयं का कारोबार स्थापित कर लिया।
इनमें शासकीय अहिल्याश्रम क्रमांक-2 भी शामिल है जहां दो साल पहले कपड़ों पर जरदौसी वर्क, गहने, जूट का काम, सुतली का सामान, थर्माकोल के आइटम व कपड़ों पर कढ़ाई आदि सिखाई गई। कुछ छात्राएं पारंगत हुई और घर पर काम शुरू कर, उत्पाद बेचने लगीं। उन्हें देख 139 छात्राओं ने अलग-अलग समूहों में कारोबार स्थापित कर लिया। इससेकुछ छात्राओं की मासिक आय 500 से 1000 रुपए तक हो गई जो वे पढ़ाई व अन्य कामों पर खर्च होने लगी।
पड़ोसियों से खोजा बाजार : सातवीं की छात्रा रानू जायसवाल ने बताया मैंने गहने बनाने से लेकर जूट का काम सीख लिया। फिर समस्या आई बेचने की। शुरुआत पड़ोसियों से की। फिर तो घर के लोग भी शामिल हो गए।
पढ़ाई के लिए सीमा निर्धारित : प्रधानाध्यापक भावना चांदोलकर व प्रशिक्षक रचना सबरवाल बताती हैं छात्राओं का आत्मनिर्भर होना अच्छी बात है लेकिन उन्हें व अभिभावकों को सीमित समय पर ही कारोबार करने की हिदायत दी है ताकि पढ़ाई प्रभावित न हो।
पैसे जमा करने पर भी जोर
छात्रा अनिता परिहार व अंकिता यादव बोलीं दो साल पहले रंगीन दीपक बेचकर पैसे कमाए तो लगा हम भी बड़े हो गए। अब हमारा जोर पैसा जमा करने पर है।
अन्य स्कूल भी ले रहे हैं सबक
राज्य शिक्षा केंद्र की ब्लॉक जेंडर कॉर्डिनेटर वैशाली केतकर का कहना है अहिल्याश्रम की तरह 23 स्कूलों की मॉडल क्लस्टर शालाओं में छात्राओं को प्रशिक्षण दिया जाता है। इंदौर के कुछ स्कूलों में छोटे स्तर पर शुरुआत भी हुई है। वहां भी छात्राओं द्वारा बनाए सामानों की बिक्री के प्रयास किए जा रहे हैं।