बीकानेर.
राज्य में भाजपा शासन के आखिरी बजट में भी बीकानेर उपेक्षित ही रहा। राजस्थान को बीमारू प्रदेश की श्रेणी से बाहर निकालने का दावा करने वाली मुख्यमंत्री लगता है बजट निर्धारण करते समय बीकानेर को नगर निगम बनाने की बात ही भूल गईं। इस बजट में बीकानेर को एक ग्रामीण एडीशनल एसपी और फोरेंसिक लैब मिली है।
इसके लिए मुख्यमंत्री साधुवाद की पात्र हैं लेकिन इनका आमजन से कोई जुड़ाव नहीं है। पुलिस के कार्य के बोझ को हल्का करने की दृष्टि से यह घोषणा की गई प्रतीत होती है। ग्रामीण का एडीशनल एसपी मिलने से जिले में कानून व्यवस्था को बनाए रखने में कुछ सहूलियत हो सकती है लेकिन आम नागरिक की सुविधा इस बजट में गौण साबित हुई है।
राजस्थान में भाजपा का शासन आने के बाद शहरवासियों को उम्मीद थी कि चुनाव से पहले यह सरकार बीकानेर को नगर निगम का दर्जा दे देगी लेकिन इस आम बजट ने शहरवासियों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। यही नहीं वेटेरनरी विश्वविद्यालय, फूड साइंस कॉलेज, मत्स्य कॉलेज की संभावनाएं भी दम तोड़ गईं।
रविन्द्र रंगमंच आज भी अधूरा पड़ा है। इसे पूरा करने के लिए सरकार ने कोई नई व्यवस्था नहीं दी, जबकि पूर्व में इसकी जांच के नाम पर ही लाखों रुपया बर्बाद कर दिया गया। एडीबी वित्त पोषित राजस्थान शहरी ढांचागत विकास परियोजना के तहत राज्य के कुछ ही शहरों में विकास योजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिनमें बीकानेर शामिल नहीं है। हालांकि शहर में आरयूआईडीपी के कार्य चल रहे हैं।
अलगे वर्ष मार्च में यह प्रोजेक्ट समाप्त हो जाएगा, जबकि शहर में विकास की संभानाएं अभी खत्म नहीं हुई हैं। रेल बाइपास शहर पहले ही खो चुका है। इसके स्थान पर गजनेर रोड पर ओवेरब्रिज बन रहा है। जबकि चौखूंटी ओवरब्रिज का मामला खटाई में पड़ता नजर आ रहा है। शहर को रेल फाटकों की समस्या से निजात दिलाने के लिए बजट में कोई घोषणा नहीं की गई। बजट संभाग के चूरू और श्रीगंगानगर तक ही सिमट कर रह गया।
विकास की दृष्टि से पिछड़े क्षेत्र के वाशिंदे एक आर्थिक इकोनोमिक जोन, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए हवाई सेवा, सिरेमिक लैब के लिए संशोधित बजट सहित कई उम्मीदें लगाए बैठे थे लेकिन एक भी पूरी नहीं हुई। शहर भर की सड़कें टूटी पड़ी हैं, जिनपर चलना भी दूभर है। नई सड़क तो दूर इनकी मरम्मत का भी ख्याल विभाग को नहीं आता।
प्रारंभिक शिक्षा बोर्ड के लिए आयुक्तालय के कर्मचारी लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। सरकार ने प्रस्ताव भी मंगवा लिए लेकिन वह भी ठंडे बस्ते में चले गए हैं। बजट भाषण के दौरान मुख्यमंत्री ने भले ही शेरो-शायरी करके वाहवाही लूटी हो लेकिन बीकानेर की जनता को इससे मायूसी ही मिली है।
बजट में बीकानेर की उपेक्षा के लिए यहां के राजनेताओं को जिम्मेवार ठहराया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। सत्ता पक्ष के नेताओं की पुकार ऊपर तक सुनी ही नहीं जाती। यह उनकी आंतरिक पीड़ा है, जिसे वे अब तक झेल रहे हैं। जिले के एक मात्र भाजपा विधायक को संसदीय सचिव का दर्जा ऐन चुनाव के वक्त मिला तो वह भी विवादों में घिर गया। राज के लोग आपसी टांग खिचांई में ही लगे रहे और शहर का विकास गौण हो गया।
वहीं विपक्ष में बैठे कांग्रेसी नेता भी अपेक्षा के अनुरूप सरकार पर दबाव नहीं बना सके। बीकानेर को जरूरत है ऐसे कद्दावर नेताओं की जिनकी बात सरकार में ऊपर तक सुनी जा सके और उन्हें महžव मिले।