न्यूयार्क.
अमेरिका में हुए एक अध्ययन के अनुसार सकारात्मक सोच को बढ़ावा देने और व्यवहार में बदलाव लाने के लिए इस्तेमाल होने वाली ‘एंटी-डिप्रेसेंट’ (अवसाद रोधक) दवाएं आमतौर पर उन्हीं मामलों में कारगर हैं जिनमें अवसाद बीमारी के स्तर तक बढ़ चुका है।
पत्रिका ‘पीएलओएस मेडिसिन’ में प्रकाशित इस अध्ययन के अनुसार अवसाद दूर करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली ‘प्रोजक’ जसी दवाएं ज्यादातर मामलों में मरीजों को कुछ खास फायदा नहीं पहुंचाती हैं।
इस अध्ययन के तहत ‘यूनिवर्सिटी आफ हल’ के अनुसंधानकर्ताओं ने इस बात की जांच की कि अवसाद की दवाओं के असर और मरीजों में बीमारी की गंभीरता के बीच क्या संबंध है। अनुसंधानकर्ता इरविंग किर्श और उनके सहयोगियों ने अवसाद के मरीजों पर ‘प्रोजक’, ‘इफैक्सर’, ‘सरज्ॉान’ और ‘सैरोक्सैट’ दवाओं के असर का विo£ेषण किया।
अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि जिन मरीजों में अवसाद गंभीर बीमारी का रूप ले चुका है उनमें दवाओं का असर जल्दी हुआ और बेहद कारगर रहा। किर्श के अनुसार, ‘‘हालांकि ‘एंटी-डिप्रेसेंट्स’ का इस्तेमाल करने वाले मरीजों को दवाओं से फायदा होता है लेकिन दूसरे विकल्प भी इस दिशा में कारगर हैं। यह साबित करता है कि रासायनिक दवाओं के इस्तेमाल के बिना भी अवसाद का इलाज संभव है।’’