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जरूरतमंदों की उम्मीदों पर खरा उतरे बजट

यह ठीक ही कहा गया है कि किसी अर्थव्यवस्था की मानवीय पहचान इस बात से होती है कि सबसे गरीब और जरूरतमंद लोगों की कठिनाइयां कम करने पर उसमें कितना ध्यान दिया जाता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो केंद्रीय बजट के आकलन का एक अति महत्वपूर्ण पक्ष यह होगा कि वह गरीब जरूरतमंद तबकों की उम्मीदों पर कितना खरा उतरता है।

इसमें कितने प्रावधान ऐसे होते हैं, जो कमजोर तबके के उत्थान के क्रम में मददगार साबित होते हैं। आगामी वित्तीय वर्ष की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह होगी कि इस वर्ष देश के सभी जिलों में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का विस्तार होना है। अत: इस योजना के लिए बजट को तेजी से बढ़ाना बहुत जरूरी है। एक जिले की औसत आवश्यकता प्राय: इस संदर्भ में सौ करोड़ रुपए मानी गई है। अत: राज्य सरकारों के कुछ योगदान को देखते हुए भी बजट से उम्मीद है कि वह ग्रामीण रोजगार गारंटी के लिए कम से कम पचास हजार करोड़ रुपए की व्यवस्था जरूर करेगा।

जैसा कि वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में पिछले वर्ष कहा भी था, इस स्कीम में गारंटी शब्द जुड़ा होने के कारण इसकी मांग अधिक होने पर वर्ष में बजट के बाद भी इसके लिए अतिरिक्त धन की व्यवस्था करनी होगी। फिर भी व्यावहारिक स्तर पर यह देखा गया है कि बजट में एकमुश्त काफी हद तक संतोषजनक धन की व्यवस्था हो जाने में योजना के क्रियान्वयन स्तर पर सही संकेत मिलते हैं व इसे लोगों की जरूरतों के अनुकूल आगे बढ़ाने में सहायता मिलती है।

इसके अतिरिक्त असंगठित क्षेत्र के लगभग ३७ करोड़ मेहनतकशों की सामाजिक सुरक्षा के लिए संतोषजनक कानून का भी जरूरतमंद लोग बहुत समय से इंतजार कर रहे हैं। यूपीए के न्यूनतम साझा कार्यक्रम में इसका वादा है। संसद के पिछले सत्र में असंगठित क्षेत्र की सामाजिक सुरक्षा पर विधेयक प्रस्तुत भी किया गया, पर श्रमिक संगठनों ने इसे बहुत कमजोर और अपर्याप्त कानून बताया था। यही वजह है कि उन्होंने इसे अस्वीकार कर दिया। इस स्थिति में यह कानून एक संसदीय समिति के पास विचार के लिए गया।

उन्होंने इसमें सुधार के लिए सिफारिश की व एक बेहतर, वैकल्पिक विधेयक का ड्राफ्ट भी प्रस्तुत किया। यदि इस विषय पर एक समग्र व संतोषजनक कानून पास होता है, तो निश्चय ही उसे व्यावहारिक रूप देने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों की भी जरूरत होगी। यह बार-बार कहा गया है कि मेहनतकशों की सामाजिक सुरक्षा पर हमारे देश में अभी तक बहुत कम ध्यान दिया गया व बहुत कम संसाधन उपलब्ध करवाए गए। अब इस अन्याय को दूर करने का वक्त आ गया है।

हाल के समय में किसानों की बढ़ती कठिनाइयां और गहराता दुख-दर्द बहुत चर्चा में रहे हैं। अत: किसानों, विशेषकर छोटे व मध्यम किसानों को कर्ज से राहत देने का मुद्दा जोर पकड़ रहा है व इसकी बहुत चर्चा है कि ऐसी राहत शीघ्र उपलब्ध होगी। वित्तमंत्री को अवश्य इस ओर ध्यान देना चाहिए। आगे चलकर इस दिशा में बढ़ना भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी सस्ती, स्थानीय संसाधनों पर आधारित तकनीकों को अपनाया जाए, जिससे खेती खर्चीली होने व किसानों के कर्जग्रस्त होने की संभावना बुनियादी तौर पर कम हो जाए।

हमारे समाज के कुछ तबके ऐसे हैं, जिन्हें स्वास्थ्य, आत्म-सम्मान व अपनी गरिमा के विपरीत काम करने पड़ते हैं। इनमें मैला ढोने वाले सफाईकर्मियों की स्थिति अग्रणी है। सरकार ने भी इन्हें वैकल्पिक रोजगार देने की नीति को एक प्राथमिकता बताया है। इन परिवारों की सहायता व वैकल्पिक रोजगार के लिए भी पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने चाहिए। बजट को इस ओर समुचित ध्यान देना चाहिए।

इन्हें वैकल्पिक रोजगार देने का कार्यक्रम जब आरंभिक दौर में था तो उस समय इस समुदाय में जागृति बहुत कम थी। इस स्थिति में पुनर्वास का बहुत-सा धन भ्रष्टाचारी तत्वों ने हड़प लिया था। इन परिवारों को नए सिरे से सहायता मिलनी चाहिए। इसी तरह सीवेज मजदूरों को गंभीर खतरों से बचाने का हरसंभव प्रयास करना चाहिए। बड़ी संख्या में खदान मजदूर सिलिकासिस जैसी गंभीर बीमारियों के कारण कम आयु में ही मौत की ओर बढ़ रहे हैं, उनके इलाज व राहत के लिए विशेष प्रयास की जरूरत है।

जनादेश यात्रा के समय भूमि-सुधार का उपेक्षित, पर अति महत्वपूर्ण मुद्दा फिर सुर्खियों में आया है। भूमि-सुधार पर अपेक्षाकृत कम खर्च से ही अधिक जरूरतमंदों विशेषकर भूमिहीनों को स्थाई लाभ मिल सकता है। अत: इस तरह के सबसे जरूरतमंदों से जुड़े कार्यक्रमों के लिए बजट को पर्याप्त ध्यान देना चाहिए।

शहरी निर्धन वर्ग के संतोषजनक आवास के लिए पटना व दिल्ली जैसे कुछ शहरों में महत्वपूर्ण, महत्वाकांक्षी योजनाएं बनाई जा रही हैं। अन्य शहरों में भी यह कार्य आगे बढ़ना चाहिए व इसके साथ झुग्गी-झोपड़ीवासियों की रोजी-रोटी की रक्षा को भी जोड़ना चाहिए। शहरी बेघर लोगों के लिए पर्याप्त रैन-बसेरों के निर्माण की भी बहुत जरूरत है। अत: निर्धन शहरी वर्ग के आवास व आश्रय के लिए केंद्रीय बजट को इस वर्ष बेहतर व्यवस्था करनी चाहिए।

-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।





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