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राष्ट्रीय प्रतिरक्षा की दुखती रगें

दृष्टिकोण. जैसे-जैसे 31 मार्च नजदीक आती जा रही है, वैसे-वैसे नई दिल्ली में रक्षा मंत्रालय और सेना मुख्यालय में देर रात तक काम होते देखा जा सकता है। नौकरशाह और योजनाकार असाधारण सामंजस्य और एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए मानो समय के साथ होड़ लगा रहे हैं। इससे पहले कि नार्थ ब्लॉक उनके अधिकारों में कटौती कर दे, इस पूरी गहमागहमी के पीछे उनका मकसद राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी ‘फास्ट ट्रैक’ चीजों को पहचानना और उन पर अधिक से अधिक रक्षा बजट खर्च कर देना है।

राजनीतिक सक्रियता इतनी तीव्र है और राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में राजनेताओं की अरुचि इतनी गंभीर कि भारत के रक्षा बजट पर शायद ही कभी संसद में विस्तृत बहस हुई हो। राष्ट्रीय सुरक्षा के मद में खर्च होने वाली करदाताओं की मेहनत से कमाई गई रकम पर सांसदों का रवैया आमतौर पर उदासीन ही बना रहता है, जब तक कि नियंत्रक और महालेखा परीक्षक अपनी किसी रिपोर्ट में वित्तीय अनियमितताओं और योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती का खुलासा करके उनकी तंद्रा न तोड़ दें।

ऐसे में यह स्वाभाविक है कि 96,000 करोड़ रुपए (वर्ष 2007-08) जितने विशाल रक्षा बजट को देखते हुए वर्ष के इस मौके पर रक्षा मंत्री और रक्षा सचिव (मंत्रालय के मुख्य वित्तीय अधिकारी और इसके लिए संसद के प्रति जवाबदेह होते हैं) दोनों की नींद उड़ जाती है। वर्ष 2007-08 के लिए बहुत मेहनत और विचार-विमर्श के बाद तैयार किए गए बजट के अनुमान कुछ-एक महीनों के भीतर ही पुराने पड़ जाते हैं। इससे बदतर यह कि उन्हें बजट की धनराशि को वित्त मंत्रालय को वापस लौटाने के अपयश का भागी बनना पड़ता है और अगले साल के बजट के लिए धनराशि की मांग करना संदिग्ध हो जाता है, सो अलग।

सेना को रक्षा बजट में वित्तीय वर्ष 2007-08 के निर्धारण की तुलना में 8 से 10 फीसदी वृद्धि की अपेक्षा है। सही मायनों में देखा जाए तो इस राशि के निर्धारण के बाद भी सेना पिछले वर्ष के समकक्ष ही रहेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि पहली बार भारत का रक्षा बजट 1,00,000 करोड़ का आंकड़ा पार कर जाएगा। हमारे समय का एक बड़ा विरोधाभास यह रहा है कि जब सेना आधुनिकीकरण की सुस्त रफ्तार का रोना रोती है तब भी राष्ट्रीय सुरक्षा का सबसे बड़ा रोड़ा और रक्षा मंत्रालय की सबसे बड़ी कमजोरी बजट नहीं था, बल्कि निर्धारित बजटीय राशि को खर्च न कर पाना था।

पिछले कई दशकों से भारत की सुरक्षा योजनाओं को बनाने का काम गहरे रहस्यों से घिरा रहा है। आधुनिकीकरण से जुड़ी योजनाएं और प्रस्ताव पिछले 10 से 15 वर्षो से दिए जा रहे हैं, लेकिन रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय से सिर्फ सैद्धांतिक स्वीकृति ही मिलती आई है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रत्येक वर्ष फंड निर्धारण की जद्दोजहद नए सिरे से करनी पड़ती है। साथ ही सरकार की दीर्घकालिक वचनबद्धता के अभाव में योजनाओं पर अनिश्चितता के बादल मंडराते ही रहते हैं।

कई चीजें इस थरथराहट को और गहराने का काम करती हैं। उनमें प्रमुख हैं घाटा कम करने की कवायद, लोकप्रिय आर्थिक कार्यक्रम और इस वर्ष लंबित छठा वेतन आयोग। वार्षिक से पंचवर्षीय रक्षा योजनाओं की ओर बढ़ने की अदूरदर्शितापूर्ण अनिच्छा के अलावा बजटीय राशि के खर्च न हो पाने के और भी कई कारण हैं, जिनका विपरीत प्रभाव हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा परिदृश्य पर पड़ रहा है।

पहला, सेना के तीनों मुख्यालयों को रक्षा मंत्रालय से अलग-थलग करके रखा गया है। यही नहीं, उनके साथ याचक जैसा व्यवहार किया जाता है। उनके प्रस्तावों को रक्षा विभाग, रक्षा (वित्त) विभाग और फिर वित्त मंत्रालय में क्रमिक और दोहराव वाली जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इसके बाद कहीं जाकर उनमें से कुछ मंजूरी के लिए मंत्रिमंडल के समक्ष पहुंच पाते हैं। गौरतलब है कि प्रत्येक फाइल को संबंधित विभागों की टिप्पणी हासिल करने या जांच प्रक्रिया में हफ्तों का समय लग जाता है।

ऐसे में प्रस्तावों पर मंजूरी हासिल करने के लिए एक वर्ष का समय भी पर्याप्त नहीं होता। जब तक हम सेना मुख्यालयों को रक्षा मंत्रालय से जोड़ने के लिए तीव्र इच्छाशक्ति का परिचय नहीं देते, जिससे सभी संबंधित पक्ष एक साथ बैठकर समग्र और गहन विचार विमर्श करने के बाद फाइल पर यथोचित टिप्पणी लिख सकें, तब तक तार्किक समाधान तक नहीं पहुंचा जा सकेगा। लेकिन यह बात नौकरशाहों की समझ में आए, तब तो बात बने।

दूसरा, जब तक रक्षा उपकरणों की खरीद को चुनाव के लिए पैसा जुटाने के आसान स्रोत के रूप में देखा जाता रहेगा, तब तक वे राजनीतिक पार्टियों के द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ वार और पलटवार का हथियार बनी रहेंगी। बल्कि उनसे ‘घृणित बिचौलियों’ की फसल भी फलती-फूलती रहेगी। घोटालों के आरोप-प्रत्यारोपों और जांचों के कारण भी रक्षा मंत्रालय की कार्यप्रणाली काफी हद तक प्रभावित हुई है।

इससे न सिर्फ रक्षा खर्च पर असर पड़ता है, बल्कि सशस्त्र सेना के आधुनिकीकरण की गति भी धीमी होती है। जरूरत इस बात की है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच द्वि-पार्टी या बहु-पार्टी समझौता किया जाए, जिसके तहत रक्षा संबंधी योजनाएं राजनीति के दायरे से बाहर रखी जाएं।

अंत में, हम आसानी से अनुमान लगा सकते हैं कि वित्तीय वर्ष 2008-09 के रक्षा बजट का 25 से 30 फीसदी हिस्सा तो रूस, इजरायल, फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका या अमेरिका के साथ खरीद सौदों में ही चला जाएगा। इस तरह के सौदों से हम न सिर्फ अपनी ही अर्थव्यवस्था या उद्योगों को इस रकम से वंचित कर रहे होंगे, बल्कि हम इन राष्ट्रों के हाथों स्वयं को बंधक भी बना रहे होंगे, ताकि वे हमें अत्यंत महत्वपूर्ण रक्षा परियोजनाओं में देरी, रुकावटों और लागत में बढ़ोतरी से पंगु कर सकें।

अब समय आ गया है जब हम कुछ कठोर निर्णय करें और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन(डीआरडीओ) और रक्षा उत्पादन विभाग (डीडीपी) समेत सैन्य संगठन में महत्वपूर्ण सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाएं। इसके बाद ही हम अपनी किस्मत के मालिक हो पाएंगे।

-लेखक भूतपूर्व नौसेनाध्यक्ष हैं।





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