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सॉरी, साइंस मेरी चॉइस नहीं!

अजमेर. स्कूलों में फैशन डिजाइनिंग जैसे ग्लैमरस कोर्स का चलन, जल्द कॅरियर शुरू करने की चाह और कॉमर्स में नए-नए ऑप्शंस से साइंस के सब्जेक्ट्स खास तौर से बायोलॉजी में स्टूडेंट्स की रुचि खत्म हो रही है। शहर के कुछ सीनियर सेकंडरी स्कूलों के आंकड़े बताते हैं कि सीनियर सेकंडरी लेवल पर किसी समय बेहद लोकप्रिय सब्जेक्ट रहे बायोलॉजी को ऑप्शनल के रूप में लेने वाले स्टूडेंट्स की संख्या एक-तिहाई तक घट गई है।

वहीं कॉमर्स को ऑप्शन चुनने वाले स्टूडेंट्स का आंकड़ा दुगुने से भी ज्यादा हो गया है। एजुकेशन फील्ड से जुड़े लोगों का मानना है कि बायोलॉजी की पॉपुलरिटी कम होने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला, मेडिकल फील्ड में कॅरियर बनाने के लिए स्कूलिंग के बाद कम से कम दस साल लग जाते हैं जबकि, कॉमर्स या मैथमेटिक्स लेने वाले स्टूडेंट्स को ग्रेजुएशन के बाद से ही बेहतर कॅरियर के ऑप्शन मिलने लगते हैं।

दूसरी वजह यह है कि देश में इकोनॉमी बूम की वजह से आईटी और रिटेल सेक्टर के बाद इंश्योरेंस, फाइनेंस और बैंकिंग सबसे तेज उभरते सेक्टर बन गए हैं। इनमें बड़ी इंडियन कंपनियों और मल्टी-नेशनल्स में बेहतर जॉब के अवसर उपलब्ध होने लगे हैं। यही कारण है कि स्टूडेंट्स का रुझान कॉमर्स के साथ कॅरियर ओरिएंटेड सब्जेक्ट्स जैसे मैथमेटिक्स ऑनर्स की ओर तेजी से बढ़ा है।

एवरेज स्टूडेंट भी कामयाब

लॉरेंस एंड मेयो स्कूल की प्रिंसीपल ममता भार्गव बताती हैं कि साइंस एज ए सब्जेक्ट काफी टफ पड़ता है। इसमें ब्राइट स्टूडेंट्स ही सफल कॅरियर बना पाते हैं। दूसरी ओर इकोनॉमी बूम के इस जमाने में कॉमर्स की पढ़ाई करने वाला एवरेज स्टूडेंट भी एमबीए, एमसीए कर बेहतर नौकरियां पा रहा है। ऐसे में पैरेंट्स भी अब अपने बच्चों को साइंस की ओर रुख करने से मना करने लगे हैं।

भार्गव के मुताबिक उनके स्कूल को ही लें तो टेंथ के बाद कॉमर्स और साइंस के स्टूडेंट्स का रेशियो 60:40 का हो गया है। अब जो बच्चे बायोलॉजी पढ़ भी रहे हैं उनकी भी रुचि मेडिसिन की बजाय बायोटेक्नोलॉजी की ओर हो रही है।

अब हालात अलग

हालत यह है कि अपने पहले के अनुभवों के आधार पर अगर आप यह मानते हैं कि टेंथ में टॉप करने वाला बच्च हर हाल में साइंस ही लेगा तो आप गलत भी साबित हो सकते हैं। विश्वास नहीं है तो मयूर स्कूल के प्रिंसीपल नीरज बिधौतिया की ही सुनिए, कहते हैं कि पिछले दो-तीन साल मेंकई बच्चे ऐसे आए जिन्होंने टेंथ क्लास में 90 परसेंट मार्क्‍स लाने के बावजूद आम धारणा के विपरीत साइंस न लेकर कॉमर्स स्ट्रीम को चुना।

बिधौतिया का मानना है कि बायोलॉजी लेने वाले बच्चे इसलिए कम हो रहे हैं क्योंकि इस फील्ड में कॅरियर बनाने में लंबा वक्त लगता है। डॉक्टर बन कर भी अपडेट रहने के लिए भारी मेहनत करनी पड़ती है नहीं तो पेशे से बाहर होने का खतरा पैदा हो जाता है। जाहिर है ऐसे में आसान और बेहतर कॅरियर के लिए अब पैरेंट्स भी अपने बच्चों को कॉमर्स लेने की सलाह दे रहे हैं। कुछ साल पहले यह दबाव साइंस के लिए होता था।

हालात यह हैं कि पैरेंट्स के बढ़ते दबाव के कारण बच्चों की वास्तविक पसंद कई बार परे रह जाती है। मेडिसिन के क्षेत्र में कॅरियर बनाने के इच्छुक स्टूडेंट्स की तेजी से घटती संख्या को शिक्षाविद् बेहतर संकेत के रूप में नहीं ले रहे हैं। ऐसे लोगों का मानना है कि कॅरियर ओरिएंटेड पढ़ाई कई मामलों में शुभ नहीं है।

लांग टर्म में नुकसान

मेयो कॉलेज के प्रिंसीपल प्रमोद शर्मा कहते हैं कि लंबे समय से भारत दुनिया में अपने साइंस वर्कफोर्स के कारण जाना जाता रहा है। बिजनेस, आईटी और बीपीओ जैसे सेक्टर में हमारी मजबूत स्थिति इसी कारण से बन पाई और आने वाले समय में बायोटेक्नोलॉजी में जो बेहतर भविष्य नजर आ रहा है वह भी इसी कारण से है।

वे कहते हैं, अब अगर कॉमर्स के दबदबे कारण बच्चे साइंस और मेडिसिन की ओर नहीं आएंगे तो इससे लांग टर्म में नुकसान होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि बैंकिंग, फाइनेंस, मार्केटिंग और बीपीओ जैसे क्षेत्रों में काफी अस्थिरता होती है। आज मौके हैं तो हो सकता है कल नहीं भी रहे। ऐसे में, स्थाई प्रगति के लिए नए इन्वेंशन और ओरिजनल थिंकर्स की जरूर होती है। इसके लिए हमें साइंस को लोकप्रिय बनाना ही होगा।





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