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खर्चा आधा करोड़,नकल पर लगाम नहीं

ग्वालियर.g विश्वविद्यालय स्तर की परीक्षा को अब न केवल शिक्षाविद्, बल्कि विद्यार्थी भी संदेह की नजर से देखने लगे हैं। परीक्षा संचालन की लचर व्यवस्था, परीक्षा पर होने वाला भारी भरकम खर्च, नकलचियों के बढ़ते हौसले और लगभग शत प्रतिशत रहते परीक्षा परिणाम ने शिक्षाविदों और योग्य परीक्षार्थियों को, परीक्षा प्रणाली के साथ-साथ पेपर सेटिंग में आमूलचूल परिवर्तन के लिए सोचने पर विवश कर दिया है।

जीवाजी विश्वविद्यालय द्वारा संचालित परीक्षा की व्यवस्था को देखें, तो विवि प्रशासन साल में करीब आधा करोड़ रुपए खर्च करता है। यह राशि परीक्षा केन्द्रों की व्यवस्था, पर्यवेक्षक एवं नकल पर लगाम के लिए गठित छापामार दलों पर व्यय की जाती है। इसके वाबजूद अधिकांश परीक्षा केन्द्रों पर धड़ल्ले से नकल होती है। विवि प्रशासन भी मानता है कि अंचल के लगभग हर जिले में कुछ परीक्षा केन्द्रों पर तो सामूहिक नकल जैसे हालात पाए जाते हैं। भिण्ड, मुरैना के कुछ परीक्षा केन्द्रों की स्थिति हमेशा से संवेदनशील मानी जाती रही है।

दिलचस्पी नहीं या उपद्रवियों का खौफ?

नकलची परीक्षार्थियों पर लगाम के उद्देश्य से विवि प्रशासन स्थानीय स्तर पर तो छापामार दल गठित करता ही है, विवि से भी छापामार दल, परीक्षा केन्द्रों पर औचक कार्रवाई को अंजाम देते हैं। परीक्षा केन्द्रों पर बड़ी संख्या में नकल सामग्री पाई जाती है किन्तु नकल प्रकरण नाम मात्र को बनाए जाते हैं। सवाल उठता है कि, जब छापामार दलों को यह स्थिति मिलती है तो परीक्षा कक्ष में मौजूद पर्यवेक्षक व परीक्षा केन्द्राध्यक्ष की भूमिका आखिर क्या है? क्या वे परीक्षार्थियों, उपद्रवियों के भय से सब कुछ देखते रहते हैं या नकल रोकने में उनकी दिलचस्पी नहीं रहती है?

हौसला दिखाएं भी तो क्यों?

नकल रोकने के लिए छापामार दल आखिर हौसला क्यों दिखाएं? इसका उदाहरण हाल ही में शासकीय एमजेएस कालेज भिण्ड परीक्षा केन्द्र पर हुए घटनाक्रम से लगाया जा सकता है। बीएड परीक्षा के दौरान पहुंचे छापामार दल पर उपद्रवियों ने हमला बोल दिया और उन्हें बेरहमी से पीटते हुऐ मरणासन्न स्थिति में छोड़ा। विवि प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों ने परीक्षा केन्द्र पर पहुंचने और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई करने की हिम्मत तक नहीं जुटाई। औपचारिकता बतौर, मामले की जांच के लिए विवि प्रशासन और शासन स्तर पर दो अलग-अलग कमेटियां गठित की गईं। दुर्भाग्य यह है कि तीन माह बाद भी इसमें कोई निर्णय नहीं लिया जा सका है।

पुलिस का पर्याप्त सहयोग नहीं

परीक्षा के दौरान किसी उपद्रव की आशंका के चलते विवि प्रशासन, जिला व पुलिस प्रशासन से सहयोग मांगता है। विवि प्रशासन के अधिकारियों का कहना है कि पुलिस का पर्याप्त स्टाफ नहीं मिलता। छापामार दलों के साथ यदि पुलिसकर्मी रहें तो नकलची परीक्षार्थियों और नकल माफियाओं की गतिविधियों को रोका जा सकता है।

सेमेस्टर प्रणाली से लगेगी कुछ लगाम

आगामी शैक्षणिक सत्र 2008-09 से स्नातक स्तर की परीक्षा में सेमेस्टर प्रणाली लागू करने का निर्णय शासन ने लिया। इसके तहत साल में दो बार मुख्य परीक्षा व आंतरिक मूल्यांकन परीक्षा होगी। शिक्षाविदों का मानना है कि इस प्रणाली के तहत पेपर सेटिंग प्रणाली में परिवर्तन कर नकल को काफी हद तक रोका जा सकता है।

सेमेस्टर से कितना परिवर्तन?

सत्र 2008-09 से स्नातक स्तर की परीक्षा भी सेमेस्टर सिस्टम पर आधारित हो जाएगी। इसके चलते साल में दो बार परीक्षा हुआ करेगी। शिक्षाविदों का मानना है कि परीक्षा का पैटर्न बदलने से पठन-पाठन में कुछ सुधार जरूर होगा किन्तु दृढ़ इच्छा शक्ति और कड़ी कार्रवाई के अभाव में नकल रोकना आसान नहीं है।





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