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कहां गए घड़ियाल

कोटा. तीन राज्यों से मिलकर बनाई गई नेशनल चंबल घड़ियाल सेंक्चुूरी सिर्फ नाम की ही रह गई है। पहले कभी इस सेंक्चुरी में घड़ियालों का जमावड़ा रहता था, अब पिछले पांच वर्र्षो में यहां एक भी घड़ियाल नहीं दिखा है। घड़ियालों के घर (चंबल) से ये गायब हो चुके हैं।

घड़ियालों के अस्तित्व को बचाने के लिए बनाई गई सेंक्चुरी में पिछले काफी अर्से से न तो घड़ियालों के संरक्षण के लिए कोई काम हुआ और न ही कोई योजनाएं बनी। नेशनल सेंक्चुरी घोषित होने के बावजूद यहां घड़ियालों के संरक्षण के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। चंबल नदी में रहने वाले इन प्राणियों की संख्या लगातार घटती जा रही है। जिसका कारण इनके प्रजनन केंद्र मानस गांव में रेत का लगातार अवैध खनन होना रहा है।

इस रेत में ही घड़ियालों के अंडे होते हैं, जो खनन के कारण टूट जाते हैं। जब अंडे ही नहीं बच रहे हैं तो घड़ियालों की संख्या घटती जा रही है। रेत के बिना इनका जीवन असंभव है। यदि रेत खनन की अनुमति दी गई तो इनका जीवन और सेंक्चुरी को बनाए रखना संभव नहीं हो पाएगा। वर्ष 1979 से सेंक्चुरी घोषित होने के बाद अब तक इसकी ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया है। जिसका खामियाजा है कि शीड्यूल एक के इस जानवर की जनसंख्या निरंतर घटती जा रही है।

बनेगा मैनेजमेंट प्लान

सेंक्चुरी और घड़ियालों के अस्तित्व को बचाने के लिए एक मैनेजमेंट प्लान बनाया जा रहा है। जिसमें इनके संरक्षण और जीवन को बचाने के अनेक प्रस्ताव व योजनाएं बनेंगी।’
—इंद्रराज सिंह, टाइगर प्रोजेक्ट डायरेक्टर, वन विभाग

सेंक्चुरी का क्षेत्र

तीन राज्यों (राजस्थान, मप्र, उप्र) से जुड़ी यह सेंक्चुरी चंबल नदी के 500 मीटर क्षेत्र में फैली हुई है। तीनों राज्य इसकी देखरेख करते हैं। नदी के दोनों किनारों से एक-एक किमी इसका एरिया है। यह जवाहर सागर से धोलपुर तक इसका फैलाव है। इसी के बीच घड़ियाल विचरण करते हैं। ये बहते पानी में ही विचरण करते हैं और जिंदा मछली पर निर्भर रहते हैं। इसे मारने पर भारतीय वन्य जीव सुरक्षा अधिनियम 1972 के तहत 7 वर्ष की जेल और 10 हजार रुपए जुर्माना है।





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