वाशिंगटन. दमा समेत सांस संबंधी तमाम बीमारियों की पहचान करना अब ज्यादा आसान हो जाएगा। वैज्ञानिकों ने इसके लिए लेजर लाइट तकनीक का सहारा लिया है। बुलडेर स्थित नैशनल इंस्टीच्यूट ऑफ स्टैंड्डर्स एंड टैक्नोलॉजी और यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो के सहयोग से ज्वांइट इंस्टीच्यूट के शोधकर्ताओं की टीम ने इस तकनीक का नाम ‘कैविटी इन्हैंस डायरैक्ट ऑप्टिकल फ्रीक्वैंसी कॉम्ब स्पैक्ट्रोस्कोपी’ दिया है।
सांस में मौजूद सूक्ष्म कणों की तस्वीर
इस तकनीक में लेजर लाइट के जरिये सांस में मौजूद उन सूक्ष्म कणों का पता लगाया जा सकता है, जो बीमारी के सूचक हैं। प्रमुख शोधकर्ता जुन ने बताया कि इस तकनीक से सांस में मौजूद सभी तरह के सूक्ष्म कणों की विस्तृत तस्वीर मिल जाती है। इससे वास्तविक बीमारी का पता आसानी से लगाया जा सकता है। उनका कहना है कि जब हम सांस लेते हैं या छोड़ते हैं तो उसमें नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाईऑक्साइड, पानी की भाप और कुछ मात्र में कार्बन मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड और मीथेन गैसों का मिश्रण होता है।
मालूम हो कि ये गैसें बीमारियों की जैविक पहचान में मददगार होती हैं। वैज्ञानिकों ने इस तकनीक का प्रयोग कुछ छात्रों पर किया। शोध में उन्होंने पाया कि जो छात्र धूम्रपान करते हैं उनकी सांसों में कार्बन मोनोऑक्साइड व मीथेन जैसी गैसों की मात्रा पांच गुना ज्यादा रहती है।