लंदन.
एक शोध में कहा गया है कि कुछ लोग डिप्रैशन का मुकाबला करने के लिए जो दवाइयां खाते हैं, ज्यादातर मरीजों पर उन दवाइयों का खास असर ही नहीं होता है। ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ हल की टीम ने निष्कर्ष निकाला है कि ये दवाएं ऐसे बहुत कम लोगों पर असर करती हैं, जो बहुत ज्यादा डिप्रैशन में होते हैं। अगर इस निष्कर्ष की पुष्टि हो जाती है, तो ये नतीजे बहुत परेशान करने वाले हो सकते हैं।
लेकिन दो अवसाद निरोधक दवाइयां प्रोजैक और सीरोक्जैट बनाने वाली कंपनियों का कहना है कि वे इन निष्कर्षो से सहमत नहीं हैं। सीरोक्जैट बनाने वाली कंपनी ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन का कहना है कि इस शोध में सिर्फ थोड़ी-सी जानकारी का इस्तेमाल किया गया है। जबकि क्षेत्र में बहुत-सी जानकारी और शोध मौजूद है।
प्रोजैक बनाने वाली एली लिली कंपनी का कहना है, ‘विस्तृत वैज्ञानिक और चिकित्सा अनुभवों से पुष्टि होती है कि यह अवसाद का मुकाबला करने में एक असरदार दवाई है।’ इस शोध के बावजूद अवसाद निरोधक दवाइयां खाने वाले मरीजों को सलाह दी गई है कि वह डॉक्टर से सलाह लिए बिना दवाई खाना बंद न करें। शोधकर्ताओं ने यह स्वीकार किया है कि बहुत से मरीज मानते हैं कि अवसाद निरोधक दवाइयां असरदार तरीके से काम करती हैं लेकिन लेकिन उनका तर्क है कि ऐसा शायद इसलिए होता है कि मरीज इस मानसिक स्थिति में रहते हैं कि वे अवसाद का मुकाबला करने के लिए दवाई का रहे हैं और बस यही मनोवैज्ञानिक स्थिति उनकी हालत सुधारने में मदद करीत हैं।