यह एक रोचक तथ्य है कि कृषिप्रधान देश भारत की सभी राजनीतिक पार्टियां किसान कल्याण को प्रमुखता देते हुए खासी सक्रिय नजर आती हैं। और तो और आजादी के बाद की सभी केंद्र सरकारें अपनी सर्वोच्च चिंता खेती और किसानी पर केंद्रित रखते हुए अपने बजट में इस क्षेत्र के कल्याण के लिए नई-नई योजनाओं में हर वर्ष करोड़ों रुपए का प्रावधान करती आई हैं। इन सबके बावजूद परिणाम यह है कि देश के 40 फीसदी किसान खेती से पीछा छुड़ाना चाहते हैं और यह आंकड़ा निरंतर बढ़ोतरी की ओर ही अग्रसर है। खेती से पीछा छुड़ाने वाले किसानों का यह आंकड़ा किसी निजी संस्था अथवा स्वतंत्र सर्वेक्षण का नहीं, बल्कि योजना आयोग की एक रिपोर्ट का है।
इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश के 27 फीसदी किसान खेती को फायदे का कारोबार नहीं मानते यानी वे परंपरागत किसान होने के नाते मजबूरी में ही किसान बने हुए हैं। योजनाकारों, अर्थशास्त्रियों और कृषि विशेषज्ञों के लिए यह अनुसंधान का विषय हो सकता है कि केंद्र और विभिन्न प्रदेशों की राज्य सरकारों द्वारा हर साल किसानों को लाखों-करोड़ों रुपयों का कर्ज मुहैया कराने, विभिन्न प्रकार की रियायतों और सुविधाएं देने के बावजूद देश की खेती-किसानी किसी क्षय रोगी की तरह निरंतर दुबली क्यों होती जा रही है।
देश की कृषि स्थिति पर चिंता विभिन्न राष्ट्रीय फोरमों, संस्थाओं, संगठनों, कृषि विशेषज्ञों, संसद और सड़कों पर निरंतर उठाई जाती है। लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि क्या हम हकीकत में देश की कृषिप्रधान छवि के लिए चिंतित हैं? क्या हम देश के करोड़ों छोटे किसानों और खेतिहर मजदूरों को खेती से रोजी-रोटी कमाकर खुशहाल देखना चाहते हैं? क्या हम खेती को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ के रूप में बनाए रखना चाहते हैं? यदि इन सवालों का जवाब हां है, तो इस जवाब से अन्य कई कठिन सवाल खड़े होते हैं कि फिर हजारों किसान विदर्भ और देश के दूसरे इलाकों में खेती के कर्ज से छटपटाते आत्महत्याएं क्यों कर रहे हैं।
औद्योगिकीकरण के अजगर को हम खुले आम बेरोकटोक किसानों की उपजाऊ जमीनें क्यों निगलने दे रहे हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 59वें सर्वेक्षण को आधार बनाते हुए योजना आयोग की रिपोर्ट कहती है कि वर्ष 1991 की तुलना में किसान की ऋणग्रस्तता बढ़ी है। जरूरतमंद किसानों तक बैंक ऋण सुविधा नहीं पहुंच रही है और देश का छोटा किसान अब भी महाजनी कर्ज के चंगुल में है।
हकीकत तो यह है कि सहकारी साख व्यवस्था छोटे और कमजोर किसानों के लिए कठिन है। कुछ वर्ष पूर्व एक समाचार आया था कि एक विकलांग व्यक्ति के पिता ने ऋण लिया था। 18 साल बाद सहकारी बैंक ने विकलांग का तिपहिया वाहन कर्ज वसूली में कुर्क कर लिया। ‘कर्ज लिया है तो लौटाना पड़ेगा’ इस सिद्धांत पर तभी अमल हो सकता है जब किसान लिए गए कर्ज का उपयोग कर खेती से पर्याप्त लाभ अर्जित करे। लेकिन लगता है हम किसानों को कर्ज देने में तो दरियादिली अपनाते हैं, खेती किसानी की भलाई के लिए सारे उपक्रम करते हुए उद्यमशील भी दिखाई देते हैं, लेकिन इस उद्यम के परिणामों के प्रति उतने गंभीर नहीं हैं।
इस क्षेत्र में आजादी के बाद के अनुभवों की पड़ताल करें तो यह निष्कर्ष सामने आते हैं कि साल दर साल देश के विकास का जो ब्लू प्रिंट तैयार किया जाता रहा है, उसमें क्रमश: खेती-किसानी के रंग फीके होते गए। खेती-किसानी की समस्याओं के निराकरण का एकमात्र उपाय किसानों को ऋण सुविधाओं का विस्तार करना मान लिया गया, लेकिन अब यह सिद्ध हो चुका है कि केवल ऋण सुविधाओं का विस्तार इस क्षेत्र की समस्याओं का हल नहीं है। इस बात पर चिंतन करने की जरूरत है कि कैसे किसान को कर्ज की चक्की का अनाज बनने से बचाया जाए और उसे समाज के उन वर्गो जैसा स्थापित किया जाए जो अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए निरंतर कर्ज पर निर्भर नहीं होते।
जैसे आरक्षण में पिछड़े वर्गो की क्रीमीलेयर परिभाषित की गई है, उसी तरह किसानों की क्रीमीलेयर परिभाषित होनी चाहिए, ताकि वास्तविक जरूरतमंद किसान की मदद की जा सके। होता यह है कि खेती-किसानी में जो कुछ भी कड़वा घटता है, वह सब राज्यों के मत्थे पड़ता है और कदाचित मीठा परिणाम राष्ट्रीय उपलब्धियों के खाते में समाहित हो जाता है। अब यह सवाल भी प्रासंगिक है कि जब देश का रेल बजट पृथक से प्रस्तुत होता है, तो फिर कृषिप्रधान देश का कृषि बजट अलग से क्यों नहीं बनना चाहिए।
-लेखक सम-सामयिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।