संपादकीय. टीम इंडिया का ऑस्ट्रेलिया दौरा संघर्षपूर्ण क्रिकेट से कहीं अधिक विवादों के लिए याद रहेगा। टेस्ट सीरीज की कड़वी यादें अभी जेहन से उतरी भी नहीं थीं कि कॉमनवेल्थ त्रिकोणीय श्रंखला नए विवादों का पिटारा लेकर सामने है। एंड्रयू साइमंड्स और इशांत शर्मा के विवाद के बाद अब सुर्खियों में हेडन की ‘गज भर की जुबान’ है। उन्होंने हरभजन सिंह को खुजली करने वाले एक जंगली पौधे की उपमा दे डाली।
हेडन यहीं नहीं रुके, उन्होंने इशांत पर भी गुस्सा उतारते हुए भारतीय स्पीडस्टर को रिंग में सामना करने की चुनौती दे डाली। क्रिकेट के जानकार भले ही इसे ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत पर लगी सेंध के फलस्वरूप उपजी खिसियाहट मान रहे हों, लेकिन दागदार तो क्रिकेट ही हुआ है। जाहिर है, इससे ‘जेंटलमैन गेम’ क्रिकेट की छवि तार-तार हो गई है। इन विवादों के लिए किसे दोषी माना जाए, खिलाड़ियों को, दोनों देशों के क्रिकेट बोर्डो को या खेल की शीर्ष संस्था आईसीसी को? वास्तविकता यह है कि खिलाड़ियों के साथ ये तीनों संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकतीं।
अब तक के विवादों पर इनका नजरिया मामले का किसी तरह पटाक्षेप करने का ही रहा है। यदि समय रहते सख्ती का कोड़ा फटकारा जाता, तो इन घटनाओं की अति से बचा जा सकता था। ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों की छवि पिछले वर्षो में बदमिजाज और बदजुबान के रूप में रही है, लेकिन सवाल यह है कि इन पर नकेल कौन कसे। हेडन विवाद में भी क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने स्वयं को असहाय दर्शाते हुए कंगारू ओपनर को मामूली फटकार लगाकर कर्तव्य की इतिश्री कर ली।
साइमंड्स-इशांत विवाद में मैच रैफरी को केवल भारतीय तेज गेंदबाज की तल्खी दिखाई दी। इशांत पर जुर्माना लगा, लेकिन साइमंड्स और पोंटिंग साफ बच निकले। घटना में शामिल दो पक्षों में से एक को दंडित करने का इंसाफ वाकई समझ से परे है। सीधी सी बात है कि क्रिकेट ग्राउंड आजकल साफ-सुथरे प्रदर्शन के जरिए जीत हासिल करने के ‘मंच’ की बजाय प्रोफेशनल बॉक्सिंग रिंग में बदल चुके हैं। खेल भावना को ताक पर रखकर जीत के लिए हर हथकंडे अपनाए जा रहे हैं और आईसीसी इसे ‘एग्रेसिवनेस’ का दर्जा देकर खामोश है। जरूरत इस बात की है कि आईसीसी अपना धन का मोह छोड़कर ऐसी घटनाओं पर सख्ती से अंकुश लगाए। खिलाड़ियों की यह आक्रामकता अच्छा संकेत नहीं है।