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बजट मत सुनिए, फेस रीडिंग कीजिए

विशेष टिप्पणी .पी चिदंबरम के द्वारा शुक्रवार को पेश किए जाने वाले बजट को लेकर चर्चा आम है कि यह चुनावों का साल है और वित्तमंत्री रियायतों की बरसात करने वाले हैं। बजट रियायतों का कांग्रेस (या यूपीए) को कोई फायदा मिल पाएगा ऐसी उम्मीदें केवल उसी स्थिति में की जानी चाहिए, जब चुनाव इसी मानसून के पहले मई-जून में होने जा रहे हों। इस बार मानसून कैसा होगा पता नहीं। तमाम अटकलों को धता बताते हुए ठंडी हवाएं अभी भी कायम हैं। गर्मी भी लंबी खिंच सकती है।

जनता की याददाश्त पर इतना भरोसा नहीं किया जा सकता कि वह रियायतें भी ले ले और साल भर दुआएं भी देती रहे। वर्तमान लोकसभा का कार्यकाल अगले साल मई में खत्म होने तक वित्तमंत्री अगली फरवरी में कोई रियायतों वाला बजट पेश करने की हालत में नहीं रहेंगे।

तब तक सरकार सहित सबकुछ अंतरिम हो जाएगा। वैसे भी इस गलतफहमी का इलाज नहीं कि रियायती बजट पेश करके सरकारें चुनाव जीत सकती हैं। बजटों के मार्फत ऐसा होना जरूर संभव है कि चुनाव लड़ने के लिए पार्टियों के पास धन की इफरात हो जाए। सब जानते हैं कि चुनाव जीतने के लिए धन-समर्थन का भी उतना ही महत्व है, जितना कि जनसमर्थन का।

चिदंबरम की मजबूरी है कि सरकार की माली हालत चाहे जैसी हो उन्हें ऐसा बजट पेश करना ही पड़ेगा, जिससे यूपीए सरकार की वाहवाही हो। पर इस वाहवाही की फसल यूपीए के घटक दल काट पाएंगे, निश्चित नहीं।

केवल दस राज्यों को ही पकड़ लें(उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल) तो ढाई सौ से अधिक सीटों वाले इलाके यूपीए के घटक दलों के पास नहीं हैं। शेष बीस राज्यों में दो अंकों वाली सीटें केवल आंध्र, महाराष्ट्र , असम , झारखंड, हरियाणा, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हैं। इनमें भी अंतिम तीन राज्यों की कुल 101 सीटें कांग्रेस के ऐसे घटक दलों के हुकूमत वाले राज्यों में हैं, जो मनमोहन सिंह और चिदंबरम दोनों को पिछले चार वर्षो से धमका रहे हैं। सारांश यह कि जिन उद्योगपतियों को बजट से फायदा होगा वे वोट डालने नहीं जाते।

नौकरीपेशा जनता की रुचि सरकारों में नहीं केवल आयकर की छूट सीमा तक सीमित रहती है। पेट्रोल और डीजल के दाम पहले ही बढ़ चुके हैं। यूपीए सरकार धर्मसंकट में फंसी हुई है कि वह सेतु करुणानिधान (राम) का नहीं है, कैसे कहे। सरकार के लिए इस समय करुणानिधान से ज्यादा महत्वपूर्ण करुणानिधि बन गए हैं।

बजट पेश करने के बाद वामपंथी वैसे ही तलवारें भांजने वाले हैं। आने वाले एक साल में लोकसभा सहित नौ राज्यों में चुनाव होने हैं। जो लोग ‘फेस रीडिंग’ में माहिर हैं- वे आज चुनाव भाषण सुनने पर कम और कुछ खास-खास चेहरों को पढ़ने में अपनी ताकत ज्यादा खर्च करें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।





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