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बजट : आम के लिए खास, खास के लिए आम

मुंबई. विश्लेषण :

वित्त मंत्री पी चिदंबरम कहां चूके? इस सवाल के जवाब के लिए मशक्कत करना आलोचकों और विपक्ष का काम है। लेकिन, बजट की डगर और बजट के असर पर गौर किया जाए तो जितना यह आम आदमी के लिए खास है उतना ही खास के लिए आम बजट है। निश्चित रूप से चुनाव पर पैनी निगाह कर तैयार किया गया बजट।

आयकर में राहत दी गई है। महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को विशेष रूप से। स्वास्थ्य, शिक्षा और खेलों के लिए जरूरी कदम उठाए गए हैं। इसके अलावा अल्पसंख्यक, पिछड़ी जातियां, बुनकर आदि वर्ग भी इस बजट से खुश हैं तो पर्यावरण का भी खयाल रखा गया है। महंगाई से निपटने और अर्थव्यवस्था की तेज रफ्तार जारी रखने के लिए भी वित्त मंत्री ने प्रतिबद्धता ठीक से जता दी है।

अब गरीब लोगों की बात करें। मजदूरों और कामगारों के लिए स्वास्थ्य बीमा, किसानों को कर्ज माफी, ग्रामीण अधोसंरचना और स्वास्थ्य मिशन पर पूरा ध्यान, रोजगार गारंटी योजना, बिजली उत्पादन पर जोर, गांवों में ब्रॉडबैंड, डेयरी पदाथरें के मूल्यों में कमी आदि प्रावधानों द्वारा वित्त मंत्री इस बड़ी आबादी को रिझाने में भी कामयाब रहे।

उद्योगों, कॉपरेरेट, विज्ञान आदि क्षेत्र में बजट को संतोषजनक माना जए या नहीं, यह सवाल बड़ा है। कस्टम डच्यूटी घटाई गई है लेकिन शर्तो के साथ, कॉपरेरेट टैक्स यथावत है तो उम्मीदें पूरी तरह से पूरी नहीं हुई हैं। दूसरी तरफ, रक्षा बजट में इजाफा वित्त मंत्री की खास पेशकश रही है।

इस बजट की एक महत्वपूर्ण घोषणा यह रही है कि अब हर किस्म के वित्तीय लेन-देन के लिए पैन का इस्तेमाल अनिवार्य होगा। इस प्रावधान के कारण वित्त मंत्री को अर्थवेत्ता माना जा सकता है।

प्रधानमंत्री ने इस बजट को आउटस्टैंडिंग संज्ञा दी है तो कांग्रेस और यूपीए के सदस्य चिदंबरम से गदगद हो गए हैं। आगामी चुनाव को लेकर यूपीए परिवार की चिंता भी चिदंबरम ने काफी कम कर दी है। लालू के लोक-लुभावन रेल बजट के बाद चिदंबरम का रिझाऊ आम बजट विपक्ष के सिरदर्द का कारण बन चुका है। विपक्ष जो कह रहा है कि घोषणाएं तो कर दी गई हैं लेकिन अमल कैसे होगा? सवाल जायज है लेकिन इसका फैसला तो वक्त ही करेगा, कोई पक्ष विशेष तो नहीं।





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