Manoranjan
Cinema
Interviews Interviews मुंबई.
ताज्जुब है, मुझसे जुड़ी हुई इतनी बड़ी ख़बर के बारे में मुझे ही मालूम नहीं है (खिलखिला कर हंस पड़ीं सुष्मिता सेन)! शायद ऐसी चर्चा की वजह यह है कि मेरे पास Êयादा फिल्में नहीं हैं, पर ऐसा तो शुरू से ही रहा है। मैंने एक समय में दो या तीन फिल्मों से Êयादा कभी नहीं स्वीकार कीं। मेरे लिए फिल्मों से कहीं Êयादा महत्वपूर्ण ज़िंदगी है।
सुष्मिता सेन अपनी Êिांदगी अपने अंदाज़ में जीती हैं। सुष के लिए निजी जीवन पहले है, बाक़ी सब कुछ बाद में। लेकिन क्या फिल्मी दुनिया को अलविदा कहकर वह शादी करके गृहस्थी बसाने की तैयारी कर रही हैं? आइए, इसका जवाब सुष से ही जानते हैं..
क्या आप ख़ुद को बदल नहीं रही हैं?मैं वृश्चिक राशि की हूं। यदि मैं चाहूं, तब भी ऐसी कोशिशें नहीं कर सकती। मैं किसी से मिलती या दोस्ती करती हूं, तो किसी योजना के तहत् नहीं, बल्कि दिल से करती हूं। मैं किसी के प्रति नफ़रत या नाराज़गी क्यों पालूं, जबकि मुझे पता है कि कोई मुझे जान-बूझकर तक़लीफ़ नहीं पहुंचाएगा।
सफलता को किस तरह लेती हैं?
कोई तारीफ़ करे या सफलता मिले, तो हर किसी को अच्छा लगता है। सच कहूं, तो जब कोई प्रशंसा नहीं करता, तो मन को बुरा भी लगता है।
.. और असफलता?
बड़ी सहजता से लेती हूं। असल में सफलता-असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, इसलिए आप किसी को भी नजरअंदाज़ नहीं कर सकते। सफलता अगर आगे बढ़ने का हौसला देती है, तो असफलता अहसास कराती है कि सब कुछ पाना आसान नहीं होता।
आप उदासी में भी खिलखिलाती रहती हैं?
हां, मेरी कोशिश रहती है कि दुख को सिर्फ़ अपने साथ रखा जाए। जहां तक हमेशा हंसते रहने की बात है, इसीलिए तो लोग मुझे स्पैशल समझते हैं। अपने दोस्तों के लिए भी मैं यही कहती हूं- माय डियर, हंसोगे नहीं, तो जियोगे कैसे?
दुख कब होता है?
जब रिश्तों को बेहद मज़ाक़िया तरीक़े से मसालेदार बनाकर छापा जाता है, तो दिल बहुत दुखता है। यक़ीन मानिए, अगर लोग मेरी प्राइवेसी का सम्मान करेंगे, तो मेरे दिल में कभी लोगों के लिए सम्मान की कमी नहीं आएगी।
कोई ऐसी घटना, जो कभी नहीं भूल पाएंगी?
बेशक, मेरी बेटी रेनी। जब मैंने उसे पहली बार देखा और फिर उसे वैधानिक रूप से गोद लिया अथवा जब उसने पहली बार मुझे मां कहा, मेरे लिए हर पल यादगार है।
डर कब लगता है?
सच तो यह है कि पहले मैं किसी भी बात से नहीं डरती थी। लेकिन जब से रेनी मेरी ज़िंदगी में आई है, मैं उसके लिए हर व़क्त डरती रहती हूं। दरअसल, मैं उसके साथ कभी कुछ बुरा होते नहीं देख सकती।
ज्योतिष या भविष्यवाणियों पर कितना विश्वास करती हैं?
कभी-कभी मनोरंजन के लिए मैं इनकी बातें सुन भले ही लूं, वरना भविष्यवाणियों या भविष्यवक्ताओं पर मेरा क़तई विश्वास नहीं है। अगर ज्योतिषियों की बातें सच्ची होतीं, तो अभी तक सारे के सारे करोड़पति बन चुके होते। वैसे कई लोगों ने मुझसे भी कह रखा है कि जवानी में कोई दुर्घटना मेरी जान ले लेगी, शायद 35 साल की उम्र में। देखिए, अभी तो 34वां साल चल रहा है। वैसे जो भी हो, मुझे लगता है कि मैंने भरपूर ज़िंदगी जी ली है।
अब कुछ फिल्मों की बातें.. अपनी किन फिल्मों को ख़ास मानती हैं?
मेरे लिए मेरी हर फिल्म बेबी की तरह है। हालांकि कई बार ऐसा भी होता है कि फिल्म भले ही बॉक्स ऑफिस पर न चले, मगर परफॉर्मेस को लेकर दिल में तसल्ली होती है कि काम अच्छा हुआ है। इस लिहाज़ से मैं अपनी दो फिल्मों का नाम जरूर लेना चाहूंगी- ‘समय’ और ‘¨चगारी’।
सुना है कि आप ‘समसारा’ फिल्म के डायरैक्टर पैन नलिन से बहुत प्रभावित हैं?
हां, क्योंकि नलिन ने फिल्म ही ऐसी बनाई है। अभी इस फिल्म की जब डीवीडी-वीसीडी रिलीज़ हुई, तो हमारी मुलाक़ात भी हुई थी। दरअसल, हमारे यहां तमाम तरह की फिल्में बनती हैं, पर दुनिया हमें अब भी म्यूज़िकल इंडस्ट्री के रूप में जानती है। ऐसे में हिमालय में 15 हजार फीट की ऊंचाई पर शूट करके उन्होंने अपनी भावनाओं को जो एक्सप्रैशन दिया, वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ है। ‘समसारा’ को मिले 30 इंटरनैशनल एवॉर्ड गवाही देते हैं कि डायरैक्टर विदेशी हो या भारतीय, लोग सिर्फ़ अच्छी फिल्में देखना पसंद करते हैं। नलिन ने साबित कर दिया है कि सिनेमा इज़ यूनिवर्सल लैंग्वेज!
फिर आपने उन्हें अपनी फिल्म ‘झांसी की रानी’ का डायरैक्शन क्यों नहीं सौंपा?
नलिन ने भी तो मुझे अपनी फिल्म ‘यशोधरा’ में नहीं लिया है (हंसते हुए सुष्मिता कहती हैं)। जी नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है। मुझे लगता है कि क़ुदरत को यही मंज़ूर था कि उस फिल्म का पूरा ज़िम्मा मैं ही संभालूं। अब कितना संभाल पाती हूं, यह तो नवंबर- 2009 में पता चल ही जाएगा।
‘दूल्हा मिल गया’ को दर्शक कब तक देख पाएंगे?
(हंसते हुए) दूल्हे का इंतज़ार तो मुझे भी बहुत बेसब्री से है! लेकिन दर्शकों की ़ख्वाहिश पूरी होने में अब •यादा व़क्त नहीं है। मैंने अपने कैरियर में बहुत-सी फिल्में ऐसी की हैं, जो वह उस डायरैक्टर की पहली फिल्म थी। लेकिन इस फिल्म के डायरैक्टर मुदस्सर अज़ीज़ जैसा कान्फीडैंट डायरेक्टर मैंने पहले कभी नहीं देखा।