नई दिल्ली. सरकार ने बजट में किसानों के लिए 60 हजार करोड़ रुपए कर्ज माफी की जो घोषणा की है, उसे एक जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है कि सरकार के इस आंकड़े पर पहुंचने का आधार क्या है। इस याचिका में एडवोकेट एम.एल. शर्मा ने कोर्ट से आग्रह किया है कि वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक को निर्देश दिए जाएं कि बैंकों की सूची और किसानों पर उनके बकाए की रकम बताई जाए।
याचिका में कहा है कि कर्ज माफी सिर्फ उन्हीं किसानों तक सीमित है जिन्होंने राष्ट्रीयकृत बैंकों से कर्ज लिए हैं। इसमें मांग की गई है कि कर्ज माफी योजना के दायरे में उन लोगों को भी लिया जाए जिन्होंने साहूकारों से और प्राइवेट बैंकों से कर्ज लिया है।
राशि वितरण से नेता अलग रखे जाएं
एडवोकेट शर्मा ने याचिका में कहा है कि कर्ज माफी योजना के तहत राशि के वितरण से राजनेताओं को अलग रखा जाए। उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीयकृत बैंकों का किसानों पर इतना भारी कर्ज नहीं है। याचक ने कहा है कि आरबीआई के अनुसार 29 फरवरी 2008 से पहले किसी भी बैंक की बैलैंस शीट में ‘डैड या सिक’ एग्रीकल्चर लोन का उल्लेख नहीं है। पिछले पांच वर्षो में पीएनबी, देना बैंक, यूको बैंक, भारतीय स्टेट बैंक जैसे कई बैंकों अपने पब्लिक इश्यू में घोषणा नहीं की है कि उनका किसानों पर कोई कर्ज बकाया है।
याचक ने कहा है कि किसानों पर 60 हजार करोड़ का कर्ज आंकने के लिए कोई पुख्ता डाटा नहीं है। इसलिए यह राशि सिर्फ चुनावी फंड है जिसे किसानों के नाम पर नेता सरकारी खजाने से निकाल रहे हैं।