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अतुल्य ही बना रहे भारत का चेहरा

दृष्टिकोण. देश के पर्यटन उद्योग के लिए गोवा से फिर एक बुरी खबर आई है। पिछले दिनों वहां के मनोरम बीच पर एक 1५ वर्षीय ब्रिटिश युवती की संदिग्ध हालत में लाश पाई गई। उसके परिजनों का आरोप है कि बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। वह अपने परिवार के साथ भारत घूमने आई थी। शायद उसने कहीं पढ़ रखा होगा कि भारत प्राचीनतम सभ्यताओं वाला देश है, जिसकी संस्कृति में स्त्रियों की ‘पूजा’ की जाती है और जिसके संस्कारों में अतिथि को ‘देवताओं’ का दर्जा हासिल है।

पिछले कुछ समय से शांत समझे जाने वाले गोवा में ऐसी वारदातों की संख्या बढ़ सी गई है। इससे पहले भी अलग-अलग मूल की विदेशी महिलाएं गोवा प्रवास के दौरान अपने साथ हुई छेड़खानी की रिपोर्ट कर चुकी हैं। यह सही है कि पुलिस ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए आने वाले पीड़ित पक्ष को आमतौर पर हतोत्साहित करने का काम करती है और यह बात सिर्फ गोवा पुलिस ही नहीं, देश के दूसरे राज्यों की पुलिस पर भी लागू होती है। लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि जिस राज्य की समूची अर्थव्यवस्था की धुरी सिर्फ पर्यटन उद्योग पर टिकी हो, वह अपने यहां आने वाले पर्यटकों के प्रति इतना संवेदनहीन कैसे हो सकता है?

इस मामले में दूसरे राज्य भी पीछे नहीं हैं। पर्यटकों के आकर्षक गंतव्य के रूप में तेजी से उभरे राजस्थान में उदयपुर और जोधपुर जैसी जगहों पर छेड़खानी के मामले प्रकाश में आए। आगरा, मुंबई समेत मेडिकल टूरिज्म और आयुर्वेद को अपना यूएसपी बनाकर प्रचारित करने वाले केरल में भी विदेशी महिला पर्यटकों के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार की कोशिश हुई। सबसे शांत और सुरक्षित माने जाने वाले हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी एक कोरियाई युवती को बलात्कार का शिकार बनाया गया। यह फेहरिस्त काफी लंबी है।

यदि यही हाल रहा और हम अपने पर्यटकों की सुरक्षा और सम्मान की रक्षा नहीं कर सके, तो तेजी से विकसित और लोकप्रिय हो रहे भारतीय पर्यटन उद्योग के सामने गंभीर संकट खड़ा हो जाएगा। यह महज संयोग नहीं है कि अमेरिका और ब्रिटेन की सरकारें अपने महिला पर्यटकों को इस बाबत सुरक्षा संबंधी चेतावनी जारी कर चुकी हैं। देश का पर्यटन मंत्रालय ‘अतुल्य भारत’ के नाम पर पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए देश-विदेश में जो अभियान चला रहा है और उस पर जितना धन खर्च कर रहा है, उसका औचित्य तभी सिद्ध हो सकता है, जब देश में बाहर से आने वाले विदेशी और देशी पर्यटकों की सुरक्षा बिल्कुल पुख्ता हो, वरना पर्यटकों के साथ होने वाली आपराधिक और अशोभनीय घटनाएं भारत को लेकर दुष्प्रचार का ऐसा सबब बनेंगी कि सारा ‘सद्प्रचार’ धरा रह जाएगा। पर्यटन मंत्रालय ने इस दिशा में कुछ प्रयास जरूर किए हैं, लेकिन उनका अभी तक कोई परिणाम नहीं निकल पाया है।

इस प्रयास के तहत ‘विशेष टूरिस्ट फोर्स’ का गठन किया गया है, जो स्थानीय पुलिस बलों के अलावा अलग से पर्यटकों को जरूरी सुरक्षा, सूचनाएं और ट्रांसपोर्ट वगैरह मुहैया करवाएगा। केंद्रीय पर्यटन मंत्री का दावा है कि यह टूरिस्ट फोर्स आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, गोवा, केरल, महाराष्ट्र, हिमाचल, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, उत्तरप्रदेश और दिल्ली जैसे पर्यटन के लिहाज से आकर्षक और संवेदनशील राज्यों में किसी न किसी रूप में काम करने लगी है। देश के ये दस राज्य पर्यटन उद्योग से सर्वाधिक कमाई करने वाले राज्य हैं, लेकिन पर्यटकों को लेकर उतने ही संवेदनहीन हैं।

इस मामले में केंद्र की दूसरी मुश्किल यह है कि राष्ट्रीय धरोहरों और पर्यटनस्थलों के रखरखाव और उनको आकर्षक व सुगम बनाने के लिए बुनियादी ढांचे वगैरह विकसित करने में वह अपनी चाहे जितनी चला ले, पर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी मूलत: राज्य सरकार की होने के कारण वह बहुत आगे बढ़कर काम नहीं कर पाता।

यह सही है कि पर्यटन उद्योग के हिसाब से भारत में अपार संभावनाएं हैं। जितनी विविधता और दर्शनीयता यहां के विभिन्न क्षेत्रों-प्रदेशों में है, उतनी दुनिया के शायद ही किसी अन्य देश के पास हो। यही वजह है कि यहां आने वाला पर्यटक एक देश में आकर भी अनेक देशों की विभिन्नता और अलग-अलग मौसम व भिन्न सांस्कृतिक वातावरण का आनंद प्राप्त करता है। आज भारत लगभग पचास लाख विदेशी पर्यटकों को आकर्षित कर रहा है, जो विश्व पर्यटन के औसत से कहीं अधिक है। लगभग बीस लाख घरेलू पर्यटक भी प्रतिवर्ष देशभ्रमण कर रहे हैं। दरअसल, पिछले तीन-चार सालों से देश के पर्यटन उद्योग में लगातार तेजी दिखाई पड़ी है।

आंकड़ों पर नजर डालें तो २क्क्५ में जहां देश में कुल चालीस लाख विदेशी पर्यटक आए, वहीं २क्क्६ में इनकी संख्या बढ़कर छियालिस लाख हो गई और २क्क्७ में यह आंकड़ा लगभग पचास लाख तक पहुंच गया। बीते साल में इससे ९६९६ मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई, जो पिछले साल के मुकाबले २३ प्रतिशत अधिक है। यही नहीं, जनवरी २क्क्८ में जितने विदेशी पर्यटक भारत आए, वह भी बीते वर्ष की इसी समयावधि की तुलना में १क् प्रतिशत अधिक हैं।

मतलब यह कि देश में पर्यटकों के खिलाफ होने वाली हिंसक और शर्मनाक घटनाओं का अभी तक कोई नकारात्मक असर उनकी संख्या और आकर्षण पर नहीं पड़ा है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि पर्यटकों की सुरक्षा, सम्मान और सुविधा के प्रति पूर्ववत उदासीनता बरतकर ज्यादा देर तक अप्रभावित रहा जा सकता है।

दरअसल, ‘अतुल्य भारत’ का एक चेहरा वह है, जो पर्यटकों को लुभाने के लिए भारत सरकार के अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय अभियानों, उसकी प्रचार पुस्तिकाओं और बड़े-बड़े विज्ञापनों में दिखता है- यह चेहरा मोहक आमंत्रण से लबरेज है। लेकिन दूसरा चेहरा उस मोहक चेहरे को बिगाड़ने को बेचैन है। इस पर अंकुश लगाना होगा वरना एक बार यदि नकारात्मकता और संदेह की हवा चल पड़ी, तो अतुल्य भारत का अभियान उसका मुकाबला नहीं कर पाएगा। इसलिए अतिथियों को ‘देवता’ भले न मानिए, पर उन्हें कम से कम ‘मनुष्य’ तो मानिए। यही नैतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से उचित होगा।





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