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नए रंग-रूप में जारी है इंसानी जिस्म की खरीद-फरोख्त

क्या आप कभी पुष्कर गए है? वहां शानदार ऊंट, घोड़े, गाय-बैल और तगड़े सांड भारी-भरकम कीमतों में खरीदे और बेचे जाते हैं।पर खरीदारों को जानवरों को समझने के लिए उन्हें छूने, उनके साथ विभिन्न मुद्राओं में फोटो ख्ंिाचवाने और अदा की गई राशि को लेकर डींग मारने जैसी अभद्रता जब आप देखते हैं तो यह चुभती है। यह आपको प्राचीन रोम के उस मंच की याद दिलाती है जहां ग्लैडिएटरों को बेचने और खरीदने के लिए लाया जाता था या जैसे पहले अमेरिका में गुलामों को बेचा-खरीदा जाता था।

गौरतलब है कि दास प्रथा को समाप्त करने की वजह से ही लिंकन की हत्या की गई थी। ऐसे में १५क् साल बाद भी इंसानों का सौदा अलग-अलग तरीकों से जारी है। यह सही कि आज गुलामों को खरीदा और बेचा नहीं जा रहा है, लेकिन स्त्री-पुरुष और बच्चों का शोषण करने के लिए व्यापार हो रहा है। इस प्रकार की बातें विरक्ति पैदा करती हैं, न।

पर क्या आईपीएल के लिए क्रिकेटरों की हाल में हुई नीलामी से कुछ इसी तरह की विरक्ति आपके अंदर पैदा नहीं होती? आखिर हम एक दूसरे बहाने और तरीके से यही सब तो कर रहे हैं? इसमें भी व्यापार का तरीका रईस और ताकतवर लोगों द्वारा इंसान की खरीद-फरोख्त का ही है। आज भी धनी लोगों द्वारा स्त्री-पुरुष, बच्चों और जानवरों को खरीदा जाता है। पालतू जानवरोंया ऐसा ही कुछ भी नाम आप दे सकते हैं।

ऐसे में खुली नीलामी की प्रक्रिया द्वारा क्रिकेटरों को खरीदने में ऐसा बुरा क्या है? मेरे अनुमान से कुछ भी नहीं। सिवाए इसके कि शरीर की यह सौदेबाजी एक घृणित कार्य है और यह तब और भी गलत हो जाता है जब इसके लिए नए-नए तरीके गढ़े जाते हैं। हालांकि मैं इसका जवाब भी जानता हूं। यूरोप में फुटबॉल खिलाड़ियों की खरीद को देखिए। जब बेकहम मैनचेस्टर यूनाइटेड को छोड़कर रियल मैड्रिड के लिए खेलते हैं तो इसमें गलत क्या है? क्योंकि इसके लिए उन्हें अधिक पैसा मिलता है।

इसी प्रकार जब वह रियल मैड्रिड को छोड़कर लास एंजिल्स गैलेक्सी के लिए खेल रहे हैं तो भी इसमें गलत क्या है? क्योंकि गैलेक्सी ने उन्हें अधिक पैसा देकर खरीद लिया है। क्यों सुपर मॉडल्स अधिक पैसे के लोभ में एक फैशन ब्रांड से दूसरे ब्रांड की ओर नहीं भाग रहे हैं? ऐसे में भारत के धनी लोग मुंबई में क्रिकेटरों की खरीद कर अपनी धन-संपति पर क्यों नहीं इतरा सकते?

इसी तर्क के आधार पर रईस और ताकतवर लोग नाभिकीय विज्ञानियों को खरीद बदनाम देशों को लीज पर क्यों नहीं दे देते? हम अपराधियों की खरीद-फरोख्त की भी इजाजत क्यों नहीं देते? क्या फर्क पड़ता है कि निर्धन देशों की सौंदर्य साम्राज्ञियों को अमीर देश अपनी अय्याशियों के लिए खरीद लें। खासकर जब ऑस्ट्रेलिया सरीखे देश में वेश्यालय तक स्टॉक मार्केट में दर्ज है? आखिर यह एक तरह से प्रतिभाओं का पलायन ही तो है। जो उनकी भरपूर कीमत अदा करने में सक्षम है वह उन्हें खरीदने का अधिकारी है। आज की वैश्विक दुनिया में यह बुरा विचार नहीं है।

हालांकि यह एक बेहूदा तर्क है। सिर्फ पैसे से इनका निर्णय नहीं हो सकता। इसीलिए सरकारें अस्तित्व में है ताकि पूरा विश्व चंद अमीर और ताकतवर लोगों की मील्कियत न बन सके। यही वजह है कि ओलंपिक सरीखे दुनिया के चंद प्रतिष्ठित खेल एक निश्चित अंतराल के बाद संपन्न होते हैं ताकि सर्वश्रेष्ठ ही शीर्ष पर पहुंचे।

इस बाबत प्रoA बहुत सीधा है आप जब पैसे का प्रभुत्व स्वीकारेंगे तो खेल भावना का क्या होगा? यही वजह है कि खेल की दुनिया के दिग्गज सितारे पैसे की चमक से स्वयं को बचाते रहे। हाल ही में पैसे की महिमा का खेल जगत में प्रवेश हुआ और कई स्पर्धाएं होने लगीं, जहां से प्रतिभाओं की खरीद-फरोख्त की जाने लगीं। अन्यथा इसके पहले तो खेल और देश का नाम ही सबकुछ हुआ करता था।

आखिर यह बदलाव आया कैसे? खेलों के मनोरंजनीकरण से। जिस तरह समाचारों का मनोरंजनीकरण मीडिया को तबाह किए डाल रहा है, वैसे ही खेलों का मनोरंजनीकरण इसकी मूल भावना पर विपरीत प्रभाव डाल रही है। यह सब कुछ डब्ल्यू-डब्ल्यूएफ के शुरुआती दौर की याद दिलाता है। सौभाग्य से सारे खेल नहीं बिके हैं। अभी भी ऐसे खेल बाकी हैं जो लोग अपने देश और उसके सम्मान के लिए खेलते हैं।

अंत में आखिरी बात यह है कि यदि रईस और ताकतवर लोग हमारे खिलाड़ियों को खरीदकर अपनी-अपनी टीम बना लेंगे तो उन्हें राजनीतिज्ञों की खरीद-फरोख्त कर अपनी पार्टी बनाने और संसद व विधानसभाओं पर नियंत्रण स्थापित करने से कौन रोक सकता है? सरकार को प्रतिभाओं से जुड़ी एक निर्धारित मूल्य सूची जारी कर किसी प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति कर देनी चाहिए जो खरीद-फरोख्त के कानूनों पर निगाह रख यह सुनिश्चित करे कि वे समय से आयकर समेत वैट चुकाते रहें।





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