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परमाणु समझौते पर अमेरिका की जल्दबाजी

दृष्टिकोण. परमाणु समझौते पर अमेरिका द्वारा हर महत्वपूर्ण मोड़ पर दबाव बनाना अब कोई नई बात नहीं रह गई है। सच तो यह है कि जुलाई 2005 में अमेरिका द्वारा जब सबसे पहले समझौते की पेशकश की गई थी, दबाव तभी से बनाया जाने लगा था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी माना था कि उनको इस समझौते का ड्राफ्ट वॉशिंगटन पहुंचने पर ही दिया गया था।

उन्होंने लोकसभा को बताया कि कैसे उन्होंने अमेरिकी अधिकारियों से कहा कि वह किसी भी करार पर तब तक हस्ताक्षर नहीं करेंगे, जब तक वह परमाणु ऊर्जा आयोग (एईसी) के अध्यक्ष द्वारा समर्थित न हो। और इस तरह वह बातचीत 12-15 घंटे तक रुकी रही, क्योंकि उस समय परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अनिल काकोदकर प्रधानमंत्री के दल में शामिल नहीं थे। काकोदकर उस वक्त बीजिंग की यात्रा पर थे, जो पहली उड़ान पकड़ करार पर दस्तखत के मौके पर वॉशिंगटन पहुंचे।

पिछले साल फिर अमेरिका ने भारत पर अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा संस्था (आईएईए) से बात करने का दबाव बनाया। यहां तक कि राष्ट्रपति बुश ने मनमोहन सिंह को उनकी अफ्रीका यात्रा के दौरान फोन किया, तो अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडालिजा राइज ने विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी से अनुरोध किया कि भारत सरकार इस करार पर जल्दी करे। उसके बाद अमेरिकी वित्त मंत्री हैनरी पॉल्सन और भूतपूर्व विदेश मंत्री हैनरी किसिंजर भी इस सिलसिले में भारत आए।

भारत ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु संस्था से बातचीत आखिरकार शुरू की। हालांकि उसका कारण अमेरिकी दबाव न होकर वामदलों की सशर्त अनुमति थी, जिसके तहत आईएईए से बातचीत के नतीजे को पहले यूपीए-वामदलों की कमेटी को दिखाया जाना थ। अब अमेरिकी दबाव फिर से बन रहा है कि भारत आईएईए से उनके द्वारा निर्धारित शर्तो पर बातचीत जल्द से जल्द समाप्त करे। एक बार भारत अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को अपने नागरिक नाभिकीय संयत्रों के निरीक्षण की इजाजत दे देता है तो उसके पास ज्यादा कुछ करने को रह नहीं जाएगा। कारण, तब 45 देशों के नाभिकीय आपूर्तिकर्ता देश और अमेरिकी कांग्रेस के हाथ में कमान चली जाएगी। अमेरिकी दबाव के अंदाज पर एक नजर डालना उचित रहेगा।

10 फरवरी को अमेरिकी राजदूत डेविड मल्फोर्ड भारत को जल्दी करने को कहते हैं। उनका कहना था कि अगर अभी नहीं, तो यह डील कभी नहीं।

20 फरवरी को तीन प्रभावशाली अमोरिकी सीनेटर मनमोहन सिंह से मिलते हैं और जुलाई तक करार करने की समयसीमा रखते हैं। उनमें से एक जोसेफ बीडान कहते हैं कि अगर भारत को करार करना है तो कुछ हफ्तों में ही कार्यवाही करनी होगी।

26 फरवरी को व्हाइट हाउस उम्मीद करता है कि भारत इस करार के फायदों के मद्देनजर इस दिशा में आगे बढ़ेगा।

27 फरवरी को अमेरिकी रक्षा मंत्री रॉबर्ट गेट्स अपनी भारत यात्रा के दौरान कहते हैं कि करार का समय निकला जा रहा है।

29 फरवरी को निकोलस बर्न्‍स भारत सरकार से एक दिन ‘बहादुरी’ का कदम उठाने की गुजारिश करते हैं और उम्मीद करते हैं कि आईएईए से समझौता एक या दो हफ्तों में हो जाएगा।

1 मार्च को भूतपूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति क्लिंटन के कार्यकाल में विदेश मंत्री रहे स्ट्रोब टालबोट दावा करते हैं कि अगर राष्ट्रपति क्लिंटन ने राष्ट्रपति बुश द्वारा दिए गए ऑफर का आधा भी दिया होता, तो वाजपेयी सरकार करार कर लेती।

4 मार्च को अमेरिकी सहायक विदेश राज्य मंत्री रिचर्ड बाउचर और दबाव बनाने के लिए भारत आते हैं।

अब अमेरिकी सरकार इस समझौते से होने वाले फायदों के मद्देनजर अपनी बेकरारी को छिपाने का कोई प्रयास नहीं कर रही। सीनेटर बीडान ने कहा है कि समझौते के बाद भारत की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता बहुत कम हो जाएगी। स्ट्रोब टालबोट ने अपनी 2004 में प्रकाशित किताब इनगेजिंग इंडिया में लिखा है कि अगर भारत के साथ कोई समझौता होना है तो यह उसी तरह का होगा जैसा क्लिंटन ने वाजपेयी को ऑफर किया था।

अमेरिका द्वारा 1998 में सुझाए गए नाभिकीय अप्रसार के चार महत्वपूर्ण बिंदु-परमाणु अप्रसार संधि को मानना, फिसाइल मैटीरियल संधि पर आगे बढ़ना, अपनी रणनीतिक योजना पर लगाम लगाना (किसी और नाम से ही सही) और निर्यात के कड़े नियमों का पालन-अमेरिकी नीति के आधार पर होना चाहिए। यानी कि अमेरिका को तब तक प्रयास करते रहना चाहिए, जब तक ये चारों बिंदु भारतीय नीतियों का हिस्सा नहीं बन जाते।

और आज अमेरिकी प्रशासन ठीक इसी नीति पर काम कर रहा है। क्लिंटन द्वारा सुझाए गए दो बिंदुओं (फिसाइल मैटीरियल और निर्यात पर नियंत्रण) का इस करार में भी साफ उल्लेख है। बाकी दो बिंदु इसके बाद बनने वाले नियम हाइड एक्ट में साफ किए गए हैं, जिसके अंतर्गत भारत को अपनी रणनीतिक योजनाओं को लगाम देनी होगी और परमाणु परीक्षण नहीं करने की संधि पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया जाएगा। परमाणु परीक्षण पर रोक का उल्लेख 123 समझौते में भी है, जिसके तहत अमेरिका को अधिकार होगा कि वह भारत भेजे गए नाभिकीय पदार्थो को वापस ले सकता है।

सच तो यह है कि बुश प्रशासन ने और भी ज्यादा हासिल कर लिया है, जबकि वाजपेयी सरकार ज्यादा से ज्यादा दो नाभिकीय संयत्रों को अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के लिए खोलने को तैयार थी। मनमोहन सिंह सरकार ने 35 नाभिकीय संयत्रों, जिसमें 8 पॉवर रिएक्टर शामिल हैं, को हमेशा के लिए बाहरी निरीक्षण को खोल देने का वादा किया है और इस अधिकार को कानूनन वापस नहीं लिया जा सकता।

अमेरिका की इस करार में खास रणनीतिक रुचि है। पहली तो यह कि इससे भारत की हैसियत एक रणनीतिक साझीदार से ज्यादा रहेगी। अमेरिका आज भारत के लिए जापान या ब्रिटेन की तरह भूमिका चाहेगा, जो अमेरिका की आज्ञाकारी शिष्य की तरह बात माने। दूसरे, इस करार के अंतर्गत अमेरिका भारत को एक सक्षम नाभिकीय शक्ति बनने से रोकना चाहता है। भारत की नाभिकीय क्षमता कम होने से भले ही चीन के मुकाबले भारत पीछे रह जाए, पर तब भारत की रक्षा सामग्री और मिसाइल बनाने की निर्भरता अमेरिका पर बढ़ेगी। ऐसी निर्भरता से ही तो किसी सहयोगी का भरोसा जीता जा सकता है।

-लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।





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