संपादकीय. लगातार तीन विश्व कप जीतकर एक दिवसीय क्रिकेट में अपनी बादशाहत कायम करने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम को त्रिकोणीय श्रंखला में उसी की सरजमीं पर पराजित कर धोनी के धुरंधरों ने जो कमाल कर दिखाया है वह न केवल हरेक खेल-प्रेमी भारतीय के लिए गर्व करने की बात है बल्कि क्रिकेट की दुनिया में एक बार फिर भारत का सिक्का चलने की शुरुआत भी है।
ढाई दशक पहले 1983 में इंग्लैंड में हुए वल्र्ड कप और फिर 1985 में बेंसन एंड हेजेस सीरीज जीतने के बाद भारत ने कुछेक त्रिकोणीय श्रंखलाएं भले ही अपनी झोली में डाली हों, मगर मंगलवार को ब्रिस्बेन में मिली जीत का अपना अलग महत्व है। पिछले साल पहले ट्वेंटी-20 वर्ल्ड कप में भारत की युवा टीम को मिली खिताबी जीत को धुप्पल करार देने वाले भी अब यह मानने को मजबूर होंगे कि क्रिकेट में भारत का भविष्य उज्ज्वल है।
इस टीम के नए सदस्यों के शानदार प्रदर्शन ने हमारी बेंच स्ट्रेंथ में बहुतायत की स्थिति भी पैदा कर दी है। शायद भारत के क्रिकेट इतिहास में यह पहला मौका है जब टीम के लगभग हरेक स्थान के लिए चयनकर्ताओं के पास दो-तीन या इससे भी ज्यादा विकल्प मौजूद हैं। हकीकत है कि जब दुनिया की ज्यादातर दूसरी टीमें अपने रिटायर हो गए या रिटायरमेंट के करीब पहुंच चुके सीनियर खिलाड़ियों का विकल्प तलाशने की जद्दोजहद से गुजर रही हैं, तब भारत में युवा क्रिकेटरों की लंबी फौज सीनियर खिलाड़ियों की जगह लेने के लिए बेचैन है।
अपने मजबूत क्रिकेट ढांचे के लिए ख्यात ऑस्ट्रेलियाई टीम में भी ज्यादातर खिलाड़ी तभी जगह बना पाते हैं जब वे 28-30 बरस के हो जाते हैं और उनका खेल ढलान पर होता है। इसके विपरीत भारतीय टीम में 18-20 साल की उम्र वाली प्रतिभाओं को ज्यादा मौके मिलते हैं। इसी वजह से ग्लेन मैक्ग्रा और शेन वार्न के रिटायरमेंट के बाद उनके उपयुक्त उत्तराधिकारी नहीं मिलने के कारण ऑस्ट्रेलिया की गेंदबाजी की धार कुंद हो गई है, वहीं तेज गेंदबाजों इशांत शर्मा और प्रवीण कुमार के पहली ही सीरीज में शानदार प्रदर्शन ने जहीर खान, इरफान पठान और श्रीसंथ जैसे खिलाड़ियों के सामने टीम में गुंजाइश बनाने के लिए कड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
ऑस्ट्रेलिया में मिली जीत के बाद टीम इंडिया का आत्मविश्वास से लबरेज होना स्वाभाविक है मगर उसे ध्यान रखना होगा कि आत्मविश्वास का अतिरेक ही टीम ऑस्ट्रेलिया के पराभव का कारण बना है। धोनी और उनके धुरंधरों को अपना सिर ऊंचा तो पैर जमीन पर रखने होंगे और अगला विश्व कप जीत कर भारत लाना होगा, तभी वे क्रिकेट में ऑस्ट्रेलिया की बादशाहत को खत्म करने के श्रेय के वास्तविक हकदार होंगे।