HomeNewsMetrosJaipur Jaipur

अपने पांव फटी बिवाई ..

जयपुर.guys इंटरनेशनल वुमन डे पर वुमन भास्कर उन महिलाओं को सम्मानित करता है, जिन्होंने समाज से उपेक्षित व हताश महिलाओं व बच्चों के जीवन में उम्मीद की किरण बिखेरी है। उनके जीवन को संवारने में अपने जीवन को समर्पित कर दिया है। लेकिन इससे पहले उस दर्द से खुद रूबरू हरुई। उनका कहना था जाके पांव न फटी बिवाई वो क्या जाने पीर पराई।

बेटे ने दी दिशा

बेटे विक्रम के स्पेशल चाइल्ड होने की जानकारी होते ही दीपक कालरा शॉक्ड रह र्गई। दीपक के पति अमृत कालरा आर्मी ऑफिसर हैं। विक्रम के जन्म के समय वे मुम्बई में लेक्चरर थीं। बेटे के कारण जॉब छोड़ा और स्पास्टिक सोसायटी में ट्रेनिंग ली और फिर अमेरीका र्गई ताकि उसकी देखभाल बेहतर तरीके से कर सकें। पति का ट्रांसफर जयपुर होने पर यहां आ र्गई। स्पेशल स्कूल नहीं होने पर खुद ही अपनी संस्था ‘उमंग’ खोली।

दीपक को इस फील्ड में काम करते हुए 24 साल हो गए हैं। वर्ष 1998 में उन्हें नरगिस दत्त मैमोरियल अवार्ड मिला। फिर कई अवार्ड मिले। दीपक ने कहा, स्पेशल चाइल्ड की सेवा करने की प्रेरणा अपने ही बेटे से मिली। इन बच्चों को हम जितना स्नेह देते हैं उसका कई गुना हमें वापस मिलता है। प्रतिकूलताओं से हंसकर लड़ने की हिम्मत, जज्बा और जुनून इन्हीं बच्चों से सीखने को मिलता है।

पीड़ित महिलाओं को इंसाफ दिलाना मकसद

एक दिन एक महिला गांधीनगर के महिला सलाह एवं सुरक्षा केंद्र पर पहुंची। उन्होंने काउंसलर को बताया कि पति ने बुरी तरह मारा और घर से निकाल दिया। उसे सजा दिलवानी की गुहार करते हुए वे शाम तक अपनी बात पर अड़ी रहीं। इस बीच शक्तिस्तंभ में उसके रहने की व्यवस्था करवा दी गई। पांच बजते ही अचानक कहने लगीं कि घर जाना है। बच्चे इंतजार कर रहे हैं और पता नहीं पति ने भी खाना खाया होगा या नहीं? वह लौट गईं।

पेशे से वकील और एकेडमी फॉर सोशियो लीगल स्टडीज (एएसएलएस) की सदस्य धर्मेश्वरी शर्मा ने ऐसी ही कई घटनाओं का जिक्र किया, जिसने उन्हें जीवन का मकसद समझाया। उन्होंने बताया, लॉ में एडमिशन लेने का लक्ष्य जज बनना था। लेकिन महिला सलाह व सुरक्षा केंद्र में काउंसलिंग के दौरान महिलाओं की समस्याओं को करीब से जाना और उसमें जुट गई। वर्ष 2000 में एएसएलएस के तहत बेयरफुट लॉयर ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोला गया। जिसमें महिलाओं को कानूनी बारीकियों की जानकारी दी जा रही है।

ली चूड़ियां न पहनने की सौगंध

आजादी के संग्राम में भागीदार रहे परिवार में जन्मी सुमेधा कैलाश के खून में क्रांति का बीज पल रहा था। हालांकि, आजादी के बाद क्रांति समाजसेवा में परिवर्तित हो गई। बचपन बचाओ आंदोलन की डायरेक्टर सुमेधा कैलाश ग्यारह वर्ष की आयु में गौ हत्या आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के चलते जेल र्गई। शादी भी हुई तो समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी से। जिन्होंने बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के काम में जीवन झोंक दिया।

इस आंदोलन को आगे बढ़ाने की दिशा में दस साल पहले जयपुर के पास विराटनगर में बाल आश्रम की स्थापना की। यहां बाल श्रमिकों के निशुल्क आवास, भोजन, शिक्षण-प्रशिक्षण आदि की व्यवस्था है। साथ ही विराटनगर के आस-पास के करीब पचास गांवों का बाल मित्र गांव बनाया है।

इस गांव में एक भी बच्चा मजदूरी नहीं करता। सारे बच्चे स्कूल जाते हैं। इन गांवों में बच्चों की बाल पंचायत सक्रिय है। सुमेधा ने कहा कि फिरोजाबाद में चूड़ियां बनाने की फैक्ट्री में काम करने वाले बच्चों की दुर्दशा देखकर मन बेहद द्रवित हुआ। बस चूड़ियां न पहनने की कसम खा ली।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: