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जनदेवता के प्रति श्रद्धा का पर्व है महाशिवरात्रि

sफाल्गुन मास की शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहते हैं। यह पर्व वसंत आगमन के साथ आता है जब हवा में गुलाबी ठंड, बागों में आमों की मंजरियों की खुशबू, खेतों में हरियाली के साथ सरसों के पीले फूल खिले होते हैं। फाल्गुन एक खास प्रकार की मादकता, सुगंध और अंगड़ाई लिए आता है। शिवरात्रि आनंद, श्रद्धा और आराधना का पर्व है जिसे भक्त पूरे देश में पूरी तन्मयता से मनाते हैं बल्कि यूं कहिए कि इसे जीते हैं। भारत में शिव के 12 प्रसिद्ध ज्योतिर्लिग जिनमें काशी और उज्जैन के ज्योतिर्लिगों का विशेष धार्मिक महत्व है। यहां देश-विदेश के असंख्य भक्त शिव आराधना के लिए आते हैं।

भगवान शिव के माहात्म्य की विशद चर्चा पुराणों तथा प्राचीन ग्रंथों में की गई है। उनसे संबंधित अनगिनत किस्से और किंवदंतियां प्रचलित हैं। शिव को लोकमंगल का देवता माना गया है। उन्हें आदि देवता तथा देवताओं का देवता भी कहा गया है। उनका व्यक्तित्व बेहद आकर्षक, बहुआयामी तथा मिथकीय है। उनके भीतर अमृत और विष दोनों हैं। जटा-जूट सिर पर चंद्रमा, गले में सर्पो की माला, ऐसे हैं भोलेनाथ।

ऋग्वेद में भगवान शंकर के रूप वर्णन का उल्लेख है जिसमें उनके शरीर का रंग भूरा, जिस्म स्वर्ण के सदृश चमचमाता हुआ, त्रिनेत्रधारी नीली खूबसूरत जटाओं वाला बताया गया है। इनके उदर का रंग काला और पीठ का रंग लाल है। पुराणों के अनुसार इनके पांच मुख हैं, जिनकी अलग-अलग विशेषताएं हैं। महाभारत के अनुसार समुद्र से निकला हलाहल पी लेने के कारण इनका कंठ नीला पड़ गया, इसलिए इन्हें नीलकंठ भी कहते हैं।

विष्णु पुराण में इन्हें चतुमरुख और मत्स्य पुराण में अर्धनारीश्वर कहा गया है। वे कहीं भी, कभी भी प्रसन्न होने पर भक्त को आशीर्वाद दे सकते हैं। सच देखा जाए तो सही अर्थो में औघड़ी, फक्कड़ और यायावर हैं। देवताओं में शिव सबसे उदार माने जाते हैं।

गरीबों, शोषितों, बेसहारा, अपंगों जिनका कोई नहीं, उनके दाता दानी हैं। वे महंगे फल-फूल या चढ़ावे की बजाय बेल पत्र, भांग, धतूरा से ही प्रसन्न हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से अन्य देवताओं की अपेक्षा उन्हें जनदेवता कहा गया है। उनका दरबार सबके लिए खुला है। देव, दानव, मानव सब उनकी सेवा-आराधना करते हैं। भूत-प्रेत-पिशाचों को अपने साथ रखते हैं। सही मायने में वे समाजवादी हैं। कुछ उन्हें जनवादी भी कहते हैं।

भगवान शिव का निवास कैलाश है उनके जीवन में अनेक विरोधाभास हैं। यदि वह कैलाश पर विचरण करते हैं तो श्मशान में भी धूनी रमाते हैं और मानव मंगल की कामना करते हैं। कैलाश यानी समूचा हिमालय उनका अपना घर है।

इसी वजह से हिमालय और उत्तरांचल के नगरों-गांवों में हजारों शिव मंदिर उनका संदेश दे रहे हैं। शिवरात्रि के अवसर पर इन मंदिरों को पूरी तरह सजाया-संवारा जाता है और धूमधाम से पर्व मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि शिवरात्रि में शिव स्वयं विश्व में विचरण करते हैं। ऐसे में उनका दर्शन विशेष महत्व रखता है। काशी और उज्जैन के शिव मंदिरों के शेष बचे शिखरों को स्वर्ण मंडित करने का कार्य चल रहा है। परंतु शिव के व्यक्तित्व को सोने-चांदी से नहीं तौला जा सकता।

जिस शिव माहात्म्य का उल्लेख वेदों-पुराणों, धार्मिक ग्रंथों में होता रहा है उस शिव का साक्षात्कार 21वीं सदी में वेबसाइट द्वारा विज्ञान ने संभव बनाया है। अब कोई भी वेबसाइट पर घर बैठे शिव के अनेक रूपों का सीधा साक्षात्कार कर सकता है। वेबसाइट ने उन्हें अब अत्यंत लोकप्रिय बना दिया है। उनका साक्षात्कार एक रोमांच बन गया है। शिव अमृत दूसरे के लिए छोड़ देते हैं सारा विष अपने कंठ में धारण कर लेते हैं। ऐसा देवता ही हमारा आदर्श बन सकता है जो संपूर्ण मानवता का उद्धारक हो।

शिव भक्ति का महत्व विगत वर्षो में काफी बढ़ा है। खासकर युवा पीढ़ी और स्त्रियों में। कुमारी बालाएं अच्छे वर की प्राप्ति के लिए शिव की आराधना करती हैं। दुनिया भर की युवा पीढ़ी सुख-शांति और अमन-चैन के लिए बाबा के दरबार में शीश नवाती है। इन विदेशी युवाओं के लिए बाबा विश्वनाथ और गंगा जीवनदायिनी शक्ति है। बाबा के दरबार से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता है, इसलिए उनके प्रति आम भक्तों में अगाध श्रद्धा और समर्पण का भाव है।

-लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं।





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