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उत्कर्ष का साझा सफर

भोपाल. इंदौर के पास छोटा-सा गांव, पालदा। आम, निर्धन ग्रामवासियों के बीच एक साधारण नाम, शांताबाई सोनगरा। पति सब्ज़ी का ढेला लगाते, शांताबाई घर के कामों के अलावा सिलाई करतीं। किसी तरह गृहस्थी चल रही थी।

लेकिन शांताबाई खुद भी नहीं जानतीं थीं कि उनके अंदर छुपी एक तेजस्वी और सेवाभावी महिला बाहर आने के लिए सिर्फ एक अवसर की तलाश में है। और एक दिन वह मौका उनके द्वार आ गया। वर्ष 2002 में स्वशक्ति परियोजना के अन्तर्गत महिलाओं के स्व सहायता समूह बनाने के लिए पालदा को भी चुना गया।

पांचवी तक शिक्षा प्राप्त और चेतना-सम्पन्न शांता बाई ने इस प्रशिक्षण को सफलतापूवर्क पूरा किया। उनकी लगन ने आयोजकों को प्रभावित किया। इसके बाद बारी आई व्यवसायिक प्रशिक्षण की। शांताबाई ने कुशलता के साथ मोमबत्ती, पेन बाम और वॉशिंग पाउडर बनाना सीख लिया। लेकिन यह उपयोगी शिक्षा उन्होंने केवल अपने विकास के लिए नहीं सीखी थी। उन्हें ख्याल था, उन हज़ारों महिलाओं का जो बहुत विपन्नता में जीवनयापन कर रहीं हैं। उनके जीवन-स्तर को सुधारने के लिए शांताबाई ने सभी ज़रूरतमंद महिलाओं को इकट्ठा कर मोमबत्ती, वॉशिंग पाउडर आदि का प्रशिक्षण देना शुरू किया। इस ख्याति के फलस्वरूप उन्हें आस-पास के गांवों से भी प्रशिक्षण देने के लिए बुलाया जाने लगा। शांताबाई खुद आर्थिक रूप से अधिक सक्षम नहीं हैं, लेकिन उन्होंने प्रशिक्षण देने से इनकार नहीं किया। वे सिवाय आने-जाने के किराए के कोई शुल्क नहीं लेतीं। कुछ समय बाद ही मध्यप्रदेश एड्स नियंत्रण समिति द्वारा पालदा में एड्स की जानकारी के प्रचार के लिए 20 महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया। शांताबाई इनमें से एक थीं।

इस संवेदनशील मुद्दे को शांताबाई ने पूरी गहराई से समझा और जल्द ही ज़िम्मेदारी के साथ महिलाओं को इस सम्बंध में जागरूक करने में जुट गईं। ग्रामीण निरक्षर महिलाओं को उनकी भाषा में, उनकी ही सखी समझाती तो बात तुरन्त समझ में आ जाती। फिर शांताबाई का तरीका भी बेहद सरल और प्रभावी होता।

स्वास्थ्य के गम्भीर मुद्दों पर उनकी सम्प्रेषणीयता के कारण ही उन्हें आकाशवाणी में वार्ता के लिए बुलाया गया। दूरदर्शन के कल्याणी कार्यक्रम में उन्हें अतिथि वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया।

इसके अलावा उन्होंने स्वशक्ति परियोजना में ही फोटोग्राफी भी सीखी और बैंक से लोन लेकर पुराना कैमरा खरीद काम भी शुरू कर दिया। 8 मार्च 2005 को वे भोपाल में आयोजित एककार्यक्रम में अध्यक्ष के तौर पर बोल रहे मुख्यमंत्री की तस्वीरे उतार रहीं थी कि मीडिया की नज़र साधारण ग्रामीण वेशभूषा में कुशलता से कैमरा संचालित करती इस महिला पर पड़ी और कई फ्लैश चमक उठे।

वे अगले दिन कई अखबारों की सुर्खियों में थीं। हाल ही में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन द्वारा 50 वर्षीय शांताबाई पर केन्द्रित 30 मिनट का वृत्तचित्र बनाया गया है, ‘टिमटिमाते दीप जो मशाल बन गए।’ और यह मशाल चुपचाप लोगों के जीवन के अंधकार को कम करने के लिए जल रही है।

शांताबाई सोनगरापालदा, इंदौर, मध्यप्रदेश





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