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Woman's Day Woman's Day अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष. एक बात कहूं, नीना जी, ‘पुरस्कार का सृजन से कोई सरोकार नहीं होता है।’यह तो समीकरणों और आपसी सहमति की शीरणी भर है।
उमस भरी दुपहरी थी। अकादमी अध्यक्ष श्री टीटी धौज कार्यालय में विराजे गुटखा चुभला रहे थे, बकरी जुगालती है, दाना-दाना। वे पीक उगलते और डस्टबिन में थूकते, थक्।
नीना ने उसके चैम्बर में कदम रखा। वह अपनी एक वर्षीय बच्ची को कंधे से चिपकाए थी। हाथ में पर्स लिए थीं। मां-बेटी दोनों पसीना-पसीना हो रहीं थीं। नीना के आकस्मिक आगमन से धौज जी चौंके। नीना की आवभगत में वे स्वानुशासन और पदेन प्रोटोकॉल की तमाम हदें लांघ गए थे। वे अपनी रिवॉल्विंग चेयर से उठ, लपक कर देहरी तक गए। नीना ने हाथ मिलाने के लिए हाथ भी बढ़ाया, पर बीच में ही समेट लिया था, कुछ विचार कर।
दोनों हाथ फैलाकर अनुनय करते हुए धौज जी ने कुर्सी की ओर इशारा किया-‘नीना जी, आप खड़ी हैं, कुर्सी पर बैठिए ना।’
नीना असमंस में थी। बैठूं या कहानी पकड़ा कर लौट पडूं।
अपनी कुर्सी पर बैठते हुए धौज जी ने हाथ फैलाकर विनती की- ‘नीना जी, बैठिए न आप। प्लीज़ बैठिए।’
नीना उनके आग्रह की अवहेलना नहीं कर पाई। अकादमी अध्यक्ष ने ये पलक-पावड़े उस नीना के लिए बिछाए थे, जो साहित्य में शिशु है। हां, वह खूबसूरत है, सलोनी है और जवान है।
साठ वर्षीय धौज जी का कद छोटा और बदन मोटा था। तोंद जितनी आगे थी, पीछा उतना ही पीछे था। चलते तो, लगता लुढ़क ज़्यादा, चल कम रहे हैं। उनका रंग केंचुल उतरे सर्प सा दहकता था। कौड़ी सरीखी उनकी आंखों में मोतियाबिंद उतरा था। वे पैंट पर कुर्ता पहने थे।
उनकी तृषित आंखें नीना के गोल गुलाबी कपोलों पर बनी हुई थीं। नीना ने लिफाफा आगे बढ़ा कर कहा- ‘सर मीरा ने गरल पीकर दर्द लिखा था अपनी कविता में, मैंने गम पीकर पीड़ा लिखी है अपनी कहानी में।’
‘नीना जी, जुलाहे के काते कौन गांठ मारे।’ उन्होंने लिफाफे से कहानी निकाली, रिमार्क लगाया और पीए के पास भिजवा दी। नीना ने कुर्सी पर बैठते ही मीनू को अपनी जांघों पर खड़ा कर लिया था। धौज जी ने गुटखा थूककर कहा- ‘नीना जी, अंदर रूम में बैठते हैं। बच्ची को चपड़ासन खिला लेगी। नीना का कलेजा दहल कर रह गया था।
धौज जी की संकीर्ण और संवेदनहीन सोच के सामने वह थरथरा गई थी। इन आंखों में भी वैसा ही काला था, जो कि उसके मरणासन्न पति के सेठ जी की आंखों में दिप रहा था, जब वह देव के एवज में नौकरी मांगने गई थी। नीना के जी में उठा था, कुछ कह दूं बद्तमीÊा को। दूसरे ही क्षण उसने खुद को संयमित कर लिया था। दो कमरों का किराया और रचनाओं का पारिश्रमिक ही अब उनकी गृहस्थी का खेवैया है।
नीना की तिक्त भाव भंगिमा देख, धौज जी ने बात मोड़ दी- ‘नीना जी, मैं पिछले कई दिनों से इस खुशफहमी में हूं कि आप सरीखी संजीदा और समझदार अकादमी की सरस्वती सभा में हो।’
‘सर सरस्वती सभा को साहित्कारों का कुंभ माना जाता है। ना मैं मनीषी हूं, ना मैं विदुषी हूं। ले दे कर चंद कहानियां लिख पाई हूं।’
धौज जी ने आंखें मीचीं, कहने लगे- ‘नीना जी सरस्वती सभा से साहित्य का क्या सरोकार? मैं अकादमी का अध्यक्ष होकर भी साहित्यकार नहीं हूं।’ नीना की गोद में खेलती बच्ची की चुलबुलाहट बढ़ती जा रही थी।
धौज जी कुर्सी से उठे। उन्होंने चिड़िया की तरह फुदकती चिहुंकती बच्ची को नीना की गोद से अपनी बांहों में खींच लिया था। सत्ताइस की नीना की गोरी, छरहरी देह मानो कुदरत के निष्णात हाथों गढ़ी गई थी। निकलता कद। मध्यम काठी। हल्के पीले रंग की साड़ी में वह ऐसी दिख रही थी, जैसे विद्युत चलित स्वर्ण गुड़िया हो। धौज जी को मद का दौरा पड़ा। नीना और उनकेबीच तैंतीस साल का अंतर था। नीना के स्वर्गीय ससुर उनके दोस्त रहे। वे पिछले दिनों तक नीना को बेटी कहते थे। वक्त की करवट, आज उन्हें बकरानीत निकट किए थी।
उन्हें मालूम नहीं, खेलती बच्ची ने आले में रखी चीज़ की तरह कब उनके मुंह से बत्तीसी खींच ली थी। धौज जी बच्ची के हाथ से डेंचर छुड़ाने का जितना प्रयास करते थे, बच्ची उस अनूठे खिलौने को काबू रखने के लिए हाथ झटकती और मुट्ठी कस लेती थी। दोनों के मुंह एक थे, पोपले। धौज जी हैरान। नीना के उदास होठों पर हल्की-सी हंसी आई। उसने बच्ची को बांहों में लिया और डेंचर धौज जी को थमा दिया था।
नीना ने धौज जी को औपचारिकतावश याद दिलाया-‘सर, मैंने भी कथा पुरस्कार के लिए अपना कहानी संग्रह भिजवाया है, इस बार।’
धौज जी ने छोटी सिसकारी ली। बोले- ‘आप समय से संपृक्त नहीं हैं।’
‘सर, यह निर्णायक वगैरह हैं ना..।’
‘निर्णायक। नीना जी, घोड़ा कितनी दुलत्ती मारे, पीठ से ऊपर जाने से रहा।’
नीना ने बच्चे को कंधे से लगाया और पर्स उठाकर चल दी। धौज जी कहने लगे- ‘नीना जी, एक बात कहूं, बुरा नहीं मानेंगी आप?’
दरवाज़े के बाहर कदम रखती नीना ठिठक गई थी। ‘सर, आप पापा की उम्र के हैं। आपकी बात का मैं नाचीज़ बुरा मानूं..’
‘इन दिनों तुम और जवान लगने लगी हो।’
धौज जी की बात कलेजा चीरती चली गई थी। अपनी बुजुर्गी और अकादमी अध्यक्ष की सब हदें चींथ दी हैं इन्होंने। जी में आया-खरी-खोटी सुना दूं बुड्ढे को, पर Êाहर का घूंट पीकर रह गई। घृणा और क्षोभ से उसके होठों पर आई वक्रता को धौज जी पुलक मान बैठे थे।
रिक्शे पर बैठ घर आती नीना आत्मग्लानि से झुलसी जाती थी। नीना के पति, देव का पिछले दिनों शरीर का बायां पक्ष निर्जीव हो गया था। वे बिस्तर पर लेटे-लेटे कुछ कह रहे थे। उनके दाएं हाथ में पत्र था। नींद-भरी मीनू को नीना ने पलंग पर सुला दिया। टीनू दूसरी ओर लेटा था। वह आहत मन से कुर्सी पर बैठ गई थी।
अकादमी की जीप से एक बाबू पत्र लेकर आया था। देव ने वह पत्र नीना को पकड़ा दिया। नीना ने पत्र पढ़ा। जो आदमी तीन-तीन, चार-चार महीने रचनाओं की स्वीकृति, अस्वीकृति नहीं भेजता, वह इतना तत्पर कि मेरे घर पहुंचने से पहले ही रचना की स्वीकृति घर आ गई।
दूसरे दिन नीना के घर के सामने सरकारी जीप आकर रुकी। नीना के साहित्यानुरागी ससुर परमेश्वर प्रसाद परम जी, जिनसे नीना ने कलम पकड़नी सीखी, धौज जी के लंगोटिया यार थे। धौज जी जब आते, घंटी बजा कर ही आया करते थे लियाकत से। देव की उपस्थिति की धुकधुकी उनमें अलग से बनी रहती थी। आज दोनों ही बात नहीं। परम जी नहीं रहे। देव बीमारी से बेजान था।
धौज जी हाथ में डलिया लिए आए। दो जन और थे। नीना अंदर से बाहर आई। उन लोगों को आततायियों की तरह आया देख, नीना ने खीज और क्रोध से माथा पीट लिया। धौज जी कुर्सी पर बैठ गए थे। उनके साथ दो व्यक्ति और थे। धौज जी ने लंबी सांस मारी और अपनी बगल बैठे एक शख्स के कंधे पर हाथ रखा-‘नीना जी, आप सुंदर रिजे हैं।
विश्वविद्यालय में हिन्दी रीडर पद पर हैं। अकादमी के कथा पुरस्कार के तीन निर्णायकों में से एक।’ नीना के मन में आया - पिछले दिनों इन्हीं रिजे जी का नाम अखबारों में था। पैसे लेकर पी-एचडी कराने के आरोप में यूनिवर्सिटी ने इन्हें ब्लैक लिस्टिड कर दिया है।
द्विरंगीबाल और मेहंदी लगे दढ़ियल चेहरे वाले पचपन के रिजे की नज़रें नीना पर टिकी थीं। ‘सचमुच नीना नूर है।’
धौज जी ने दूसरे व्यक्ति से परिचय कराया- ‘आप कोनेराम जी हैं। आप सुलझे हुए ब्यूरोक्रेट तो हैं ही, अच्छे साहित्यकार भी हैं। आप कथा साहित्य पैनल के दूसरे निर्णायक हैं।’ उनकी आंखें नीना से हट नहीं रहीं थीं। नीना के माथे पर पड़ी सलें उभरीं। ‘सरकार ने अनियमितता और गबन के आरोप में इनको बर्खास्त किया हुआ है।’
देव दूसरे कमरे में पलंग पर लेटे सब सुन रहे थे। सुंदरजी रिजे और कोनेराम का नाम सुन कर उनकी एक मुट््ठी कस गई थी। नीना की घायल ह्दय कलिका पर एक घाव और पड़ गया था। कोनेराम बोले- ‘नीना जी आप नवोदित कथाकार ज़रूर हैं, पर लिखती समकालीनों से श्रेष्ठ हैं। तभी तो रिजल्ट शीट दोबारा बनानी पड़ी है।’ धौज जी इन दोनों से दो कदम आगे गए- ‘एक बात कहूं, नीना जी, ‘पुरस्कार का सृजन से कोई सरोकार नहीं होता है। यह तो समीकरणों और आपसी सहमति की शीरणी भर है।’ तीनों के मस्तक पर आनंदाभिषेक हुआ। भयभरी आंखों से नीना ने उनकी ओर देखा मानो सब के सब बाघ बघेरे हैं।
धौज जी बोले- ‘नीना जी, आप आपनी फोटो ले आए। आजकल में परिणामों को सरस्वती सभा में रखना है।’
नीना अंदर चली गई थी। धौज जी पल-पल आकुल व्याकुल। कुछ देर बाद भीतर से टीनू आया। वह नीना के इशारे से सीधा धौज जी के पास आ खड़ा हुआ। उसके हाथ कागज था। जो उसने धौज जी को पकड़ा दिया था। धौज जी ने आंखों पर चश्मा ठीक किया और मनोयोग से कागज़ पढ़ने लगे-
‘धौज जी कथा पुरस्कार के लिए प्रेषित मैं अपनी प्रविष्टि वापस लेती हूं। आप मेरी कहानी को भी अकादमी की पत्रिका में प्रकाशित न करें।
-नीना।’
धौज जी के हाथ से कागज़ छूट गया था और हाथ डलिया से जा टकराया था। केले, मौसमी, आम, पपीता जैसे फल फर्श पर बिखर रहे थे, इधर-उधर।
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