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सम्मान का संघर्ष

तिरुअंनतपुरम, केरल. जिस पति ने उन्हें अपने घर, देश और जीवन से बेदखल कर दिया हो, उसके पीछे आंसू बहाने से बेहतर उन्हें लगा, अपने हक के लिए संघर्ष करना। उन्होंने वही किया और इस जंग ने उन्हें घरेलू हिंसा निवारण अधिनियम के तहत न्याय पाने वाली देश की पहली महिला बना दिया।

केरल निवासी 51 वर्षीय वल्सला चन्द्रन ने आज से 25 साल पहले यदि भारतीय सेना कीचिकित्सा सेवा से इस्तीफा नहीं दिया होता, तो आज कर्नल के पद पर होतीं। एक आम भारतीय महिला की तरह उन्होंने पति और गृहस्थी को सवरेपरि मानते हुए शानदार करियर की सम्भावनाओं को वहीं विराम लगा दिया। पति चंद्रशेखर पिल्लई के साथ दुबई जाने के लिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी। पर पति के पास न उनके लिए समय था, न उनके प्रति कोई लगाव। अनजान देश में वे बिल्कुल अकेली पड़ गईं। किसी तरह वे बच्चों में मन रमाकर खुद को व्यस्त और संतुष्ट रखने का प्रयास कर रही थीं। लेकिन चंद्रशेखर इतने पर भी संतुष्ट नहीं था, अब उसे वल्सला की कोई ज़रूरत नहीं रह गई थी। उसने वल्सला को अपनी ज़िंदगी से बाहर करने का फैसला कर लिया। बिना किसी अपराध की सज़ा वल्सला को मिल रही थी।

वे उन दिनों को याद करते हुए बताती हैं, ‘तब तक वह बड़ा व्यवसायी बन चुका था और उसे मैं उसके स्तर के योग्य नहीं लगती थी। वह धनवान परिवार से नाता जोड़ना चाहता था। साथ ही यह भी कि मैं उसके घर और हमारे बच्चों को छोड़कर चली जाऊं। मैंने इंकार किया, तो उसने मेरे वीसा का नवीनीकरण नहीं किया। बिना वीसा के रहने पर दुबई पुलिस मुझे कभी भी गिरफ्तार कर सकती थी। मेरे पास कोई चारा नहीं था, सिवाय अपना सामान पैक करने के।’ वल्सला केरल लौट आईं। उनकी ज़िंदगी बिखराव के कगार पर थी लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

दो महीने बाद ही चंद्रशेखर केरल आया, एक विधवा से दूसरी शादी कर ली और उसे अपने साथ दुबई ले गया। वह केरल के एक प्रभावशाली परिवार से ताल्लुक रखती है। चूंकि दुबई और भारत का कानून एक शादी के चलते दूसरे की इजाज़त नहीं देता, इसलिए उसने पत्नी को अपना एकाउंटेंट बताया। वल्सला को यह सारी जानकारी थी। वे कहती हैं, ‘मैं चाहती तो तभी उसके खिलाफ केस कर सकती थी पर मैं समझती हूं कि प्यार ज़बरदस्ती नहीं पाया जा सकता है।’

इसके बाद चंद्रशेखर ने वल्सला को तलाक का नोटिस भेजा। इसमें आरोप लगाए गए कि वल्सला ने उसे धोखा दिया है, उसका पूरा झुकाव आध्यात्म की ओर ही है और पत्नी के रूप में पति की ज़रूरत को वह पूरा नहीं करती है। इन आरोपों से वल्सला विचलित हुईं पर टूटी नहीं। ‘वही मुझे आश्रम ले गया था। उसकी उपेक्षा से परेशान होकर ही मैंने अपना ध्यान आध्यात्म की ओर मोड़ा। उसके व्यवहार से मेरा जीवन के प्रति उत्साह खत्म हो गया था। मैं दुबई में थी तभी, उसके कई विवाहेतर सम्बंध थे। मुझे तकलीफ होती पर मैं बच्चों की खातिर चुप रही।’

चंद्रशेखर जानबूझकर दुबई से फोन कर यह बखान करता कि वह दूसरी शादी से कितना सुखी है। जब वह एक बेटी का पिता बन गया तो उसने तिरूअन्नतपुरम स्थित अपने बंगले को बेचने का मन बनाया। यही वल्सला के लिए अंतिम आघात था। करीब एक करोड़ की इस सम्पत्ति में उनका भी आर्थिक योगदान था। अब वल्सला ने ठान लिया कि अन्याय का प्रतिकार करना है।

उन्होंने फैमिली कोर्ट में शिकायत दर्ज़ की। फैसला उनके हक में हुआ और कोर्ट ने एक करोड़ की ज़मानत राशि पर सम्पति को सील कर दिया। पर चंद्रशेखर किसी भी वक्त स्थगन के लिए अपील कर सकता था। वल्सला को उनके वकील ने सलाह दी कि वह घरेलू हिंसा अधिनियम का सहारा ले। वल्सला ने कोट्टायम के न्यायिक अधिकारी के समक्ष धारा 19 के अंतर्गत दावा प्रस्तुत किया कि उसका पति उसे रिहायशी और संयुक्त घर में रहने से वंचित कर रहा है। उन्होंने पुलिस सुरक्षा की भी गुहार लगाई। फैसला फिर उनके हक में हुआ और इस संवेदनशील मसले पर न्याय पाने वाली पहली भारतीय महिला बनीं।

आज वे सम्मान के साथ अपने बंगले में रह रहीं है। वल्सला के शब्दों में, ‘मैंने जो संघर्ष किया, वह अपने अस्तित्व और सम्मान के लिए किया। मेरे बेटों ने भी मुझे जीत की बधाई दी।’





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