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मैं मानिनी

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष. सृष्टि की शुरूआत से देखें, तो पुरुष के स्व के मामले में विचार, परिवार और समाज में उसकी स्थिति और भूमिका में उतना अंतर नहीं आया जितना कि स्त्री के मामले में। पहले सिर्फ दिखने में अंतर था, अब नजरिए में आ गया है। सबसे ज्यादा फर्क आया है खुद स्त्री के अपने प्रति नजरिए में। उसकी तरफ उठने वाली नजरें, उसके प्रति बनने वाले विचारों और उसके लिए किसी और की सोच के मुताबिक वह खुद को ढालती-बदलती रही है।

पुरुष स्थिर है, एक व्यक्तित्व का स्वामी है, लेकिन स्त्री? पुरुषों से खुद को बेहतर साबित कर चुकने के बाद भी, क्या वह अपने व्यक्तित्व को स्थायित्व दे पाई है? अगर जवाब न में है, तो उसका सबसे बड़ा कारण है स्व पर विश्वास की कमी।

अगर महिलाएं चाहती हैं कि उन्हें भी व्यक्ति के तौर पर पहचाना जाए, स्त्री के रूप में महÊा स्वीकारा न जाए, तो यह आवश्यक है कि वह अपना आत्मावलोकन करे और अपने व्यवहार और सोच के विषय में चिंतन भी करे, क्योंकि अब भी उसकी सोच पर अनुमोदन के साए हावी हैं।

खुद पर भरोसा
एक समय था कि घर की स्त्रियों के लिए साड़ियों की गांठ घर में ही ला दी जाती थी। छांटने और पसंद करने की न तो गुंजाइश थी और जो थोड़ी बहुत थी, उसे घर के पुरुष ही निभा लेते थे। आज स्त्रियों को अपने मनपसंद रंग-छींट पसंद करने की सुविधा है लेकिन फिर भी अपनी ही छांटकर लाई हुई साड़ी के बारे में किसी की कही गई बात से वे अपना पूरा दिन बिगाड़ सकती हैं।

मानसी दो दिन तक बाज़ार घूमकर बड़े चाव से जामुनी रंग की चमकीली किनार की साड़ी लाई। शिवरात्रि के दिन सुबह उसे पहन कर शिवमंदिर गई। वहां ननद की सखी नेहा मिल गई। नेहा ने आंखें मटकाकर सिर्फ इतना कहा ‘वाह, मेरी रंगीली भाभी।’ और मानसी का पूरा दिन इसी खिसियाहट और उधेड़बुन में निकल गया कि मैं पता नहीं कैसी दिख रही थी? पैसे बर्बाद हो गए क्या? नेहा अपने आपको समझती क्या है..वगैरह, वगैरह। इन सब खयालात का नतीजा यह रहा कि उपवास से भूखे घरवालों को दिन भर हर बात पर नेहा की बड़बड़ाहट सुननी पड़ी। इतना संत्रास मानसी के दिलो-दिमाग को तो झटका दे ही गया, ऐसा अगर बार-बार हर छोटी-छोटी बात पर होगा तो कुछ सालों बाद किसी बड़ी बीमारी के रूप में दिखने भी लगेगा। संवेदनशील होना अच्छी बात है लेकिन इतनी संवेदनशीलता भी किस काम की कि निर्थक ठिठोली के अर्थ गढ़ने लग जाएं। हो सकता है नेहा का ऐसा कोई आशय ही न हो या फिर अगर उसका ऐसा आशय था भी, तो उससे मानसी को क्यों फर्क पड़ना चाहिए था। और अगर बुरा लगा ही था तो अपने दिलो-दिमाग पर इतना नियंत्रण तो होना ही चाहिए था कि जल्दी ही उससे उबरकर इस फिज़ूल की बात को भूल जाए। नारी के व्यक्तित्व का विस्तार बहुत बड़ा है, एक साड़ी या ज़ेवर के भले-बुरे लगने से उसके आयामों में कोई परिवर्तन नहीं आ जाता। हां, अगर कोई तकलीफ या नुकसान होता है, तो वह खुद को या अपनों को ही होता है।

आवरण की आड़ में
कई सदियों से स्त्री को स्त्रियोचित रूप या गुण की परिभाषा में बांध दिया गया था। यह उसके अन्तस में इतना गहरे बैठा है कि इस पर कोई भी, कैसी भी प्रतिक्रिया उसे एक गहरी नकारात्मक भावना के गर्त में डाल देती है। वो स्त्री जो वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर नहीं है, उसे यह असुरक्षित होने का अहसास और सताता है। वो एक ऐसे विषम चक्र में फंस जाती है जहां एक तरफ असुरक्षा और दूसरी तरफ उससे उत्पन्न विकार एक दूसरे को हवा देते जाते हैं। असुरक्षा या हीन भावना रखने वाले मस्तिष्क एक और तरीका निकाल लेते हैं, इससे छुटकारा पाने का। अपने अंतर्मन के ‘मैं कुछ भी नहीं’ के ऊपर ‘मैं सब कुछ हूं’ का मुखौटा चढ़ा लेते हैं। सामाजिक समूहों में फिर ऐसी महिलाएं या तो एक किनारे कर दी जाती हैं और या फिर अपनी खिल्ली उड़वाती हैं। श्रीमती सिंह एक ऐसी ही महिला हैं, जिनका विवाह उनके पिता के धनबल से एक उच्च पदधारी महानुभाव से हो गया। ठेठ ग्रामीण परिवेश से वे एकदम अत्याधुनिक माहौल में पहुंच गईं। सो उन्होंने अपना तकिया कलाम बना लिया- ‘मैं तो रखती हूं जूते की नोक पर..’। तबादलों के कारण बदलते शहरों और परिवेश में तो यह पच्चीस-तीस साल तक तो चल गया। लेकिन अब पुत्रवधू के साथ बिल्कुल नहीं चल रहा। बेटा भी दूर होता जा रहा है, श्रीमती सिंह हैं कि आदत से मजबूर।

अपने आन्तरिक और बाह्य व्यक्तित्व का सहज स्वीकार, खुद ही उसमें नमक और चमक ला देता है। यह अपने विचारों और चुनावों पर टिके रहने का आत्मबल देता है और इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण कि मन को ठहराव और संतुष्टि से भर देता है। थोड़ा-सा परिष्कार और निखार कभी जरूरी हो, तो वह भी सही। अपनी खूबियों का स्वीकार और कमियों की पूर्ति होती रहे, तो कमतरी का अहसास क्यों हो?

ईर्ष्या का विष
एक और मनोभाव, जो आत्मविश्वास की राह में बाधा बनता है, वह है, ईष्र्या। ईर्ष्या और अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा की भावना बड़ी स्वाभाविक और नैसर्गिक है। सब में होती है किन्तु महिलाएं इसके वशीभूत हो जाएं, तो अपनी खूबियों की रही सही याद भी मिटा बैठती हैं। ईष्र्या का सबसे बड़ा काम होता है सोच को नकारात्मक और इरादों को गलत दिशा देना या कुंठित कर देना। ऐसे में आत्मविश्वास कहां टिकेगा? दूसरे क्या कर रहे हैं, कितने कामयाब हैं या नहीं - इससे प्रेरणा ली जाए, तो अच्छा होगा। अच्छे भाव की अभिव्यक्ति, अच्छे भावों को ही आमंत्रित करती है।

सुखमणिजी का विवाह बीस वर्ष की अवस्था में हो गया था। सिर झुकाए-झुकाए ही सबकी सेवा करती पच्चीस बरस हो गए। अब सिर उठने लगा था और कर्कश आवाज़ में ताने देना और बड़बड़ाना भी शुरू हो गया था। एक दोपहरी अपने ही ह्रदय की कटुता और वाणी की कर्कशता से सहम गईं वो। उन्हें लगा कि वो कैसे व्यक्तित्व में बदलती जा रही हैं। ईष्र्या जैसे कितने कलुषित, कुरूप मनोभावों में जकड़ी जा रही हैं। सो अब उन्हें क्रोध आता, पड़ोसन की नई वस्तुओं से ईर्ष्या होती या दही-बड़े कड़े बन जाने पर व्यंगात्मक टिप्पणी सुनने को मिल जाती, तो वे अवसाद में डूबने के बजाए मन ही मन अपने आपसे वाद-विवाद कर लेतीं। जिसका हर बार आखिरी निष्कर्ष यही निकलता- ‘क्या फर्क पड़ता है’। जब यह निष्कर्ष निकल आता तो वे उत्फुल्लित हो जीवन दौड़ में पुन: रत हो लेतीं और धीरे-धीरे उन्हें इस चर्चा की भी आवश्यकता पड़नी बंद हो गई। आज सुखमणि के आगे दो पीढ़ियां हैं लेकिन न तो उनके चेहरे की कान्ति कम हुई है और न ही उनके पास आकर बैठने को लालायित लोगों की।

‘मेरी अपनी भी शख्सियत है’ के निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए नारी कोई भी राह पकड़े लेकिन अपनी असुरक्षा, अवसाद और ईष्र्या की भावनाओं से छुटकारा पाना ही लक्ष्य होना चाहिए क्योंकि तभी वह सही मायनों में प्रगतिशील बन पाएगी।

इस महिला दिवस पर आपके लिए कुछ सवाल—

क्या
आपके बारे में कोई भी नकारात्मक टिप्पणी आपको लम्बे समय तक परेशान करती है?

किसी
के द्वारा आपके बनाए खाने में कमी निकाले जाने पर आपको लगने लगता है कि आप अच्छी कुक नहीं हैं? यानी किसी से मिली नकारात्मक टिप्पणी आपको खुद के प्रति अनावश्यक रूप से सचेत बना देती है?

आपने
नई साड़ी पहनी हो, तो सबसे पूछना जरूरी समझती हैं कि आप कैसी लग रही हैं?

आप
खुद कोई राय कायम करती हैं या फैसला लेती हैं तो क्या लोगों की प्रतिक्रियाओं के आधार पर उसे बदल भी सकती हैं?

किसी
की सफलता पर आप उससे अपनी तुलना कर हीनता महसूस करती हैं?

क्या
कोई भी नया काम शुरू करने के पहले पहला ख्याल यही आता है कि मैं नहीं कर पाऊंगी?

अगर इनमें से आपके चार सवालों के जवाब हां है, तो जान लें कि यह लेख सिर्फ आपके लिए ही है..





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