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सिर्फ एक कश्मीर की आजादी से क्या होगा

तीन मार्च को पाकिस्तानी खबरिया चैनलों पर जिस कश्मीर की आजादी की खबर ने दूसरी खबरों को ढंक लिया, वह कश्मीर सिंह की जेल से रिहाई के बारे में थी। कश्मीर सिंह को पाकिस्तान में वर्ष १९७३ में जासूसी के आरोप में गिरफ्तार करने के बाद मौत की सजा सुनाई गई थी। इस घटना ने उसी दिन सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष एत्जाज एहसन की लाहौर में हुई रिहाई की खबर को भी धुंधला कर दिया। साथ ही इस्लामाबाद में पुलिस और वकीलों के बीच हुई एक और झड़प को भी नेपथ्य में धकेल दिया, जो मुख्य न्यायाधीश इफ्तेखार मोहम्मद चौधरी समेत बाकी जजों और वकीलों की रिहाई की मांग कर रहे थे।

पाकिस्तान की कार्यवाहक सरकार के मानवाधिकार मंत्री अंसार बर्नी द्वारा राष्ट्रपति से माफी दिलाए जाने से पहले कश्मीर सिंह को तकरीबन पैंतीस साल वहां की अलग-अलग जेलों में काटने पड़े। यह एक अच्छी पहल थी जिसे याद रखा जाएगा। इसके अलावा कश्मीर की रिहाई को लेकर जो मीडिया सर्कस चलता रहा, उसे भी लोग भूल नहीं पाएंगे।

बर्नी के मुताबिक कश्मीर सिंह की रिहाई भारत और पाकिस्तान द्वारा एक-दूसरे के नागरिकों को भूले-भटके दूसरे मुल्क की सीमा में प्रवेश करने या तयशुदा वीजा अवधि से ज्यादा समय तक रुकने पर गिरफ्तारी और उन्हें जेल में कैद रखने जैसे चलने वाले अपेक्षाकृत बड़े मसले का एक भाग है। भारतीय उच्चयोग के एक राजनयिक के मुताबिक पाक की जेलों में ५७५ भारतीय कैद हैं, इसके अलावा हाल ही में २५ भारतीय मछुआरों को भी गिरफ्तार किया गया है। जबकि भारत में १८ मछुआरों के अलावा २क्क् पाकिस्तानी कैदी हैं। वास्तविक आंकड़ा तो इससे कहीं अधिक हो सकता है।

इसके अलावा ‘भुला दिए गए’ ५४ भारतीय युद्धबंदियांे का भी मसला है, जिनके अस्तित्व को पाकिस्तान बार-बार नकारता रहा है। सितंबर २क्क्४ में इस मसले ने फिर सिर उठाया, जब भारतीयों और पाकिस्तानियों के एक समूह से ऐसे ही एक युद्धबंदी की बेटी की दिल्ली के एक होटल में मुलाकात हुई। उस महिला ने बताया कि पंजाब की पटियाला रेजीमेंट में मेजर रहे उसके पिता शरनजीतपाल सिंह वडै़च को तीस और युद्धबंदियों के साथ अटक किले में रखा गया था। उसने अपने पिता के जीवित होने की उम्मीद जताई।

उसका नाम था सिम्मी वडै़च। उसने इस मसले पर ऑनलाइन इंटरएक्टिव मैग्जीन ‘चौक’ में लिखा और इस बात के सुबूत पेश किए कि लापता व्यक्ति पाकिस्तान की हिरासत में हैं। इन सुबूतों में टाइम पत्रिका में छपी एक फोटो और कराची से भेजा गए पत्र भी शामिल थे। इसके बाद कुछ पाकिस्तानी अखबारों ने उसका पत्र प्रकाशित भी किया, जिसमें राष्ट्रपति से अपील की गई थी।

जनवरी २क्क्७ में भारत के विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी के साथ हुई मीटिंग में पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कहा कि यदि लापता भारतीयों के रिश्तेदार चाहें तो खुद आकर पाकिस्तान की जेलों में देख सकते हैं। जून २क्क्७ में बहुत उम्मीदें लेकर जो दल पाकिस्तान पहुंचा, उसमें सिम्मी भी थीं। वहां कई जेलों और उनके रिकॉर्डस को खंगालने के बावजूद वे अपने प्रियजनों को नहीं तलाश पाए, लेकिन उन्हें अब भी भरोसा है कि वे वहां हैं।

‘सरबजीत सिंह’ का भी एक मसला है, जिसे 1990 में लाहौर, कसूर और फैसलाबाद में बम-विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार किया गया। उसके सगे-संबंधी दावा करते हैं कि यह गलत पहचान का मसला है। वह पेशे से किसान है, जो नशे की हालत में सीमा पार कर गया था। उसका जो भी कुसूर हो, लेकिन वह जेल में सत्रह साल से अधिक गुजार चुका है।

कारगिल की लड़ाई के दौरान सितंबर १९९९ में पकड़े गए दो सिपाहियों को जिस जगह पर रखा गया, उसे वे खुद नहीं पहचान सकते। भारतीय सेना ने उन्हें लापता मान लिया जबकि पाकिस्तान ने उनकी मौजूदगी जाहिर नहीं की। जसगीर सिंह और मोहम्मद आरिफ के अगस्त २क्क्४ में रावलपिंडी जेल में होने का पता चला, जब किसी तरह उन्होंने अपने घर पर पत्र भेजा। लेकिन तब तक आरिफ के परिवार ने उसे मृत मानकर उसकी बीवी गुड़िया का निकाह उसके भाई से कर दिया, जिससे वह गर्भवती हो गई। इससे अजीब नाटकीय परिस्थिति बन गई जिसकी परिणति गुड़िया के अपने पहले पति आरिफ के पास लौटने से हुई।

सौभाग्य से कश्मीर सिंह के साथ ऐसा नहीं हुआ। कश्मीर सिंह को उसी दिन रिहाई मिली, जिस दिन पाकिस्तान के हाई प्रोफाइल अधिवक्ता एत्जाज एहसन छोड़े गए। गौरतलब है कि एहसन की रिहाई के लिए अमेरिकी सीनेटरों ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति से अपील की थी। एहसन ने न सिर्फ खुद को कैद रखने वरन मुख्य न्यायाधीश इफ्तेखार मोहम्मद चौधरी और उनके परिवार को जबरन नजरबंद के खिलाफ बार-बार विरोध जताया था। हालांकि कश्मीर सिंह और एत्जाज एहसन की रिहाई की खबर भी एक बम धमाके में दबकर रह गई।





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