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हमेशा रंग नहीं लाती किसान राजनीति

दृष्टिकोण. ऐसा प्रतीत होता है कि वित्त मंत्री पी चिदंबरम बजट पेश करने के अगले दिन बहुत ज्यादा उद्विग्न थे। संभवत: उनके भीतर का अर्थशास्त्री वित्तीय जिम्मेदारियों को चुनावी वेदी पर त्याग दिए जाने के कारण चिंतित था। हो सकता है कि उनके भीतर का अधिवक्ता चार माह के भीतर 60,000 करोड़ रुपए की कर्ज माफी के निर्णय पर तर्क-वितर्क कर रहा हो या यह भी हो सकता है कि उनके भीतर का राजनीतिज्ञ समझता हो कि चुनावी बजट हमेशा वोटों में तब्दील नहीं होता या यह भी हो सकता है कि वे पत्रकारों से आजिज आ चुके हों, जो बार-बार उनसे यही पूछ रहे थे कि बजटीय प्रावधानों के लिए वे धन लाएंगे कहां से।

अंतत: उन्होंने पूरी स्पष्टवादिता का परिचय देते हुए स्वीकार ही कर लिया कि हर साल बजट पेश करते हुए उन पर चुनाव का दबाव नहीं होता है। चिदंबरम की असहज मन:स्थिति के उलट सत्तारूढ़ गठबंधन में बजट को लेकर खासा उत्साह दिखा। 10 जनपथ के बाहर पार्टी कार्यकर्ताओं की कतारें लंबी होती जा रही थीं। इस कतार में हरियाणा से आए किसान भी शामिल रहे, जो पार्टी नेतृत्व की चरण-वंदना करना चाहते थे। वहां लगे पोस्टर राहुल गांधी को ‘किसान का नेता’ करार दे रहे थे। क्रिकेट के मैदान को अधिकांश समय देने के आरोप से आजिज शरद पवार की एनसीपी भी इस भीड़ में शामिल हो गई थी। कृषि मंत्री की प्रशंसा से लबरेज पूरे-पूरे पृष्ठ के विज्ञापन सुर्खियों में थे।

पिछले वर्ष कई राज्यों के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह से पराजित होने के बाद कांग्रेस को शिद्दत से एक अदद ऐसे मुद्दे की तलाश थी, जो उसे संजीवनी दे सके। उम्मीद थी कि आरक्षण समर्थक एजेंडे से कुछ बदलाव आएगा, लेकिन आरक्षण पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में कांग्रेस इस पर सिर्फ अपना दावा नहीं कर सकती है। अजरुन सिंह ने जरूर इसके सहारे अपनी पहचान बनाने की कोशिश की, लेकिन पार्टी ने उनके नक्शेकदम पर चलने में खास दिलचस्पी नहीं दिखाई।

परंपरागत कांग्रेस वोट बैंक को फिर से अपने पाले में लाने के लिए सच्चर समिति की सिफारिशों पर भी उम्मीद लगाई गई, लेकिन यहां भी झिझक ने पीछा नहीं छोड़ा। सबसे बड़ा कारण था कि विपक्ष इसे तुष्टीकरण की राजनीति करार दे सकता था। आठ फीसदी से अधिक की आर्थिक विकास दर एक बेहतर मुद्दा हो सकता था, लेकिन ‘शाइनिंग इंडिया’ के हश्र ने इस मोर्चे पर भी सुरक्षात्मक रवैया अपनाने को मजबूर कर दिया। ऐसे में सामने आया ‘आम आदमी’ का सर्वव्यापी परंपरागत प्रतीक ‘किसान।’ भारतीय सेना के किसी जवान की ही तरह किसान को देश की अंतरात्मा का प्रहरी माना जाता है।

अगड़े-पिछड़े को आरक्षण, बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक मसला समेत शाइनिंग इंडिया पर बहस विभाजक साबित हो सकती है। ऐसे में भारतीय किसानों के अधिकार को भला कौन चुनौती देगा। खासकर जब किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याएं महज आंकड़े नहीं, बल्कि मानवीय समाज बनाने में सरकार की नाकामी का प्रतीक बन गए हों? कृषिप्रधान देश में किसानों की कर्ज माफी पर उठाई गई एक भी अंगुली राजनीतिक तौर पर विध्वंसकारी साबित हो सकती है।राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद-बीजेपी के प्रिय मुद्दे और दूसरी ओर किसान राजनीति की तुलना करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि राजनीतिक व्यस्तताओं के बीच यूपीए सरकार का पलड़ा भारी है। आतंकवाद का खतरा वास्तविक है और नक्सल समूहों का बढ़ता प्रभाव और घरेलू आतंकवाद के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। हालांकि आतंकवाद के खिलाफ नरमी के रुख वाला बीजेपी का आरोप मध्य वर्ग प्रभावी संसदीय सीटों पर रंग दिखा सकता है, लेकिन देश में उसी व्यापक अंदाज में प्रभाव डालेगा, ऐसा नहीं लगता है। ऐसे में किसानों से जुड़ा मुद्दा सभी भौगोलिक सीमाओं को पार कर भुनाया जा सकता है।

इसके बावजूद अगर यूपीए समझ रही है कि उसे चुनावी जीत का मंत्र मिल गया है, तो वह जश्न की गलती न करे। अगर किसानों की कर्ज माफी से ही वोट मिलते होते तो देवी लाल, चरण सिंह और देवेगौड़ा हमेशा सत्ता में बने रहते। किसानों की राजनीति दोधारी तलवार होती है। जहां यह अवसर प्रदान करती है, वहीं विषाद का कारण भी बनती है।

राजनीतिक दलों के लिए चुनाव के समय सबसे बड़ा खतरा बढ़ती अपेक्षाओं का होता है। परिणाम देने में नाकाम सरकार को वैश्विक स्तर पर एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ता है। 30 जून तक कर्ज माफी की योजना को अमली जामा पहना देने का वादा कर सरकार ने स्वयं को एक दायरे में बांध लिया है। अगर वह इसमें नाकाम रहती है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

क्या कुछ गलत हो सकता है इसे समझने के लिए यूपीए की 12,000 करोड़ रुपए की राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को देखने की जरूरत है। इस योजना के बाबत नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक बता चुके हैं कि 100 दिनों के रोजगार के लिए पंजीकृत परिवारों में महज 3.2 फीसदी को ही योजना के पहले वर्ष रोजगार मिला। इस योजना के तहत महज 18 दिन ही रोजगार प्रदान किया जा सका, जबकि वादा 100 दिनों का था।

इस योजना का प्रदर्शन गैर कांग्रेसी राज्य सरकारों में कहीं बेहतर रहा। गांधी परिवार के गढ़ अमेठी और रायबरेली तक में यह योजना नौकरशाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई। क्या इसी तर्ज पर और व्यापक कर्ज माफी की योजना कहीं अपनी ही अपेक्षाओं की भेंट तो नहीं चढ़ जाएगी?

किसान कर्ज माफी सरीखी योजनाओं की घोषणाओं से वोट नहीं बटोरे जा सकते, इसके लिए काफी कुछ और भी करना होगा। 2008 में आमचुनाव के मद्देनजर यूपीए को स्वयं से प्रश्न करने होंगे कि क्या उसके पास चिदंबरम के बजट को चुनावी विजय में बदलने लायक सांगठनिक संरचना है? क्या राहुल गांधी अपने देशव्यापी रोड शो में उमड़ने वाली भीड़ को वोटों में बदल सकते हैं? क्या इस बात के कोई संकेत हैं कि कांग्रेस उत्तरप्रदेश और बिहार सरीखे राज्यों में वापसी करने को तैयार है?

2004 के आम चुनाव में देश के दर्जनभर बड़े राज्यों की 440 संसदीय सीटों में से कांग्रेस को महज 100 सीटें ही मिली थीं। ऐसे में क्या कांग्रेस दावा कर सकती है कि वह किसी भी एक बड़े राज्य में अन्य पार्टियों का सूपड़ा साफ कर सकती है? क्या उसके डीएमके और लालू सरीखे सहयोगी पिछली बार का प्रदर्शन दोहराने में सक्षम हैं? इस अनिश्चित राजनीतिक दांवपेंच को वित्त मंत्री से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता है, जो स्वयं भी उस राज्य से आते हैं, जहां कांग्रेस की हालत पतली है। कह सकते हैं कि अगली लोकसभा का भविष्य गठबंधन की गणित पर कहीं अधिक निर्भर करेगा, न कि बजटीय घोषणाओं पर।

-लेखक सीएनएन-आईबीएन के एडीटर इन चीफ हैं।





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