इंदौर. पूर्वी रिंग रोड से लगे गणराजनगर के चंद्रशेखर गेंदालाल ने 19 जून 1997 को 400 वर्गफीट के प्लॉट के लिए 11,200 रुपए विकास शुल्क चुकाया था। इसके लिए कर्ज भी लेना पड़ा। दस साल बीत गए न कॉलोनी वैध हुई, न कोई विकास ही हुआ। लोग आज भी बुनियादी सुविधाओं से महरूम हैं। जमा पैसा कहां गया कोई बताने वाला भी नहीं।
समस्या केवल चंद्रशेखर की नहीं, मदनलाल जोधाराय, प्रभावती मेहता सहित १क्८ परिवारों की है। सभी ने १९९७ में कॉलोनी वैध कराने के लिए १४ रुपए प्रति वर्गफीट की दर से ११ लाख रुपए विकास शुल्क सरकारी खजाने में जमा किए थे। उसके बाद भी कोई झांकने ही नहीं आया। संबंधित अधिकारियों की झिड़कियों से रहवासियों के हौसले भी पस्त होने लगे हैं। वे बताते हैं कॉलोनी नियमित करने के नाम लाखों रुपए लेकर जिला प्रशासन ने छला है। हिसाब पूछो तो जिला प्रशासन और नगर निगम टालमटोल करते हैं।
चेतावनी के साथ जमा करवाया था शुल्क- १३ सितंबर १९९७ को जिला प्रशासन ने कॉलोनी को नियमितिकरण की प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश निकाला था। उसमें सभी रहवासियों को भूखण्ड निरस्ती की चेतावनी के साथ सात दिन में शुल्क जमा करने को कहा था।
क्या है समस्या- जिला प्रशासन से १९९८ में ३५४ अवैध कॉलोनियों के साथ कॉलोनी सेल नगर निगम को हस्तांतरित कर दिया था। गणराजनगर का शुल्क १९९७ में जमा हुआ था, तब सेल जिला प्रशासन के अधीन था। वह राशि निगम के खाते में जमा हो गई लेकिन निगम प्रशासन इसे नहीं स्वीकारता।
जटिल हो गए नियम- कॉलोनी सेल निगम को हस्तांतरित होने के बाद २क्क्क् से सरकार ने नियमित करने की प्रक्रिया और पेचीदा कर दी। नए नियमों के मुताबिक कॉलोनी वैध करने के लिए १क् फीसदी खुली भूमि आवश्यक है। अन्यथा कॉलोनाइजर या रहवासी संघों को उसके एवज में मौजूदा गाइडलाइन से दोगुना राशि जमा करना होगी। अब न खाली जमीन है, न कोई राशि देने की स्थिति में।
सड़क- सड़क के नाम पर बड़े-बड़े पत्थर जिन पर पैदल चलना भी मुश्किल। पानी- सरकारी स्तर पर कोई इंतजाम नहीं। बिजली- खंभे हैं लेकिन तार नहीं। दो सौ मीटर दूर से लेना पड़ा कनेक्शन। छह साल में सैकड़ों शिकायतों के बाद एक ट्रांसफॉर्मर लगाकर हाईटेंशन लाइन से जोड़ा लेकिन खंभों पर कनेक्शन नहीं हुआ। सफाई- ओपन ड्रेनेज सिस्टम। प्लॉट और सड़कों पर भरा रहता है गंदा पानी।