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प्रधानमंत्री से मिलेंगे बादल

चंडीगढ. पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल अपने दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से पाकिस्तान में मौत की सजा पाए सरबजीत सिंह को रिहा कराने का प्रयास करने की मांग करेंगे। बादल ने पाक सरकार से भी इस मामले में दया करने का आग्रह किया है।

पाकिस्तान में 1990 में हुए बम धमाकों में शामिल कथित आरोपी पंजाब के सरबजीत को मौत की सजा सुनाई गई है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ के सरबजीत सिंह की रहम अपील खारिज करने की खबरों पर बादल ने फिर से विचार का आग्रह किया है।

याचिका खारिज होना बदकिस्मती़:मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार हरचरण बैंस के मुताबिक सरबजीत की दया याचिका खारिज करना दुर्भाग्यपूर्ण है। बादल ने उम्मीद जाहिर की है कि सरबजीत सिंह के मामले में भी इन्सानियत का परिचय दिया जाना चाहिए। इससे दोनों देशों के संबंधों में और मजबूती आएगी और शांति, मैत्रीभाव व सद्भावना की गांठें और सुदृढ़ होंगी।

सीमा पार करते टूट जाता है भ्रम होशियारपुर. कश्मीर सिंह वीरवार को मेडिकल चैकअप के लिए चंडीगढ़ रवाना हो गया। उधर, कश्मीर की रिहाई से जहां गांव नंगल चोरां में खुशी का माहौल है, वहीं पाक से सजा काट लौटे कई जासूसों में सरकार व खुफिया एजेंसियों द्वारा सुध न लिए जाने से निराशा है। इनका कहना है कि देश सेवा का जज्बा लिए जब वे जासूसी के लिए जाते हैं तो उनका भ्रम सीमा पार करते ही टूट जाता है। सीमा पार करते समय पकड़े जाने पर उन्हें यातनाएं तो मिलती ही हैं, पीछे से सरकार या खुफिया एजेंसियां उनके परिवारों की कोई सुध नहीं लेतीं सजा काटकर वापस लौटने पर स्वागत के बाद उन्हें उनके रहमो करम पर छोड़ दिया जाता है।

पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और भारत की खुफिया एजेंसियां आर्मी इंटेलिजेस, रॉ, आई बी, बीएसएफ की जी सैल पर एक-दूसरे देश की खुफिया जानकारी एकत्र करने की जिम्मेदारी होती है। अक्सर गरीब परिवार के लोग इन एजेंसिंयों में काम करते हैं। जासूसी के आरोप में जब एजेंट पकड़े जाते हैं तो खुफिया एजेंसी अपना पल्ला ऐसे झाड़ लेती है, जैसे वे इन्हें जानते तक नहीं हों।

जीवन काटने को कर्ज की सलाह

गुरबख्श राम ने बताया कि उसने 17 साल पाक जेल में बिताए और 20 जून 2006 को घर लौटा था। ‘रॉ’ के लिए प्रशिक्षण के बाद 1987 में पाक सीमा में प्रवेश किया था। 1990 में लौटते समय पाक रेंजरों ने पकड़ लिया था। लौटा तो सरकार ने उसकी कोई मदद नहीं की और कर्ज लेने को कहा।

सीमा पर लेने कोई नहीं आया रोड स्थित बाड़िया कलां गांव के सुरिंदर पाल ने बताया कि वह सरकार की बेरुखी से दंग है। 1971 से लेकर 1979 तक उसने सौ से भी ज्यादा दफा सरहद पार की। 1979 में जब वह लौट रहा था तो पाक रेंजरों ने उसे काबू कर जेल में डाल दिया था। जेल में उसे गंभीर यातनाएं दी गईं। 1988 में जब पाक सरकार ने उसे रिहा किया तो बाघा सीमा पर उसे लेने कोई नहीं आया था।





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