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इनके हौसलों ने बदल दी दूसरों की दुनिया

भोपाल. d women छोटे-छोटे गांव की महिलाओं ने अपने बुलंद हौसलों और मजबूत इरादों के चलते एक अलग मिसाल कायम की है। आदिवासी जिले डिंडोरी की दुर्गाबाई अपनी कलाकृतियों के कारण देश-विदेश में पहचानी जाती हैं। राजगढ़ जिले की संतोष चौहान ने विकलांग होते हुए दूसरों को सहारा दिया तो गुना जिले की सूरतीबाई ने बंजर जंगलों को हरा-भरा कर दिया।

होशंगाबाद जिले के कांद्राखेड़ी गांव की सरपंच छोटीबाई गांव में स्वच्छता की मिसाल पेश करने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजी र्गई। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आज पेश है ऐसी ही ग्रामीण महिलाओं पर केंद्रित एक रिपोर्ट-

आदिवासी गांव से दुनिया तक.. आदिवासी बहुल जिले डिंडोरी के छोटे-से गांव बरबसपुर से निकलकर भोपाल तक पहुंची दुर्गाबाई व्याम अब दुनिया में पहचानी जाती हैं।

शोहरत की बुलंदियों तक पहुंची दुर्गाबाई कहती हैं ‘छोटेपन में शादी-विवाह में दीवारों पर चित्र बनाती थी। शादी के बाद यहां आई, तो जनगण भैया ने ब्रश पकड़ना सिखाया। धीरे-धीरे अपने चित्र बनाने लगी और लोगों को पसंद आ गए।’ ‘चैन्नई वाली किताब के लिए काम कर रही हूं।’

अगला प्रोजेक्ट पूछने पर कहती हैं। दो दशक पहले भोपाल में बस चुकी दुर्गाबाई घर पर रहकर ही काम करती हैं। दो बेटियों और एक बेटे की मां है। बेटे के साथ-साथ बेटियों को भी पढ़ा रही है। कहती है, ‘काम तो करती रहेंगी। मेरी तरह अनपढ़ न रह जाएं इसलिए खूब पढ़ाना चाहती हूं। अपने आसपास जब लड़कियों से भेदभाव के किस्से सुनती हूं, तो खराब लगता है।

नाम संतोष, काम विशाल (संतोष चौहान)
राजगढ़ जिले के डालूपुरा गांव मं रहने वाली सुश्री संतोष चौहान ने दोनों हाथ नहीं होने के बावजूद हिम्मत नहीं हारी और पैरों की सहायता से पढ़ लिखकर महिला बाल विकास विभाग में सुपरवाइजर बन गईं। सफलता की कहानी यहां आकर नहीं रुकती इन्होंने ग्रामीण क्षेत्र की १९क् महिलाओं को भी आत्मनिर्भर बना दिया है।

इतना ही नहीं इन्हें ओपन पद्धति से हाईस्कूल पास करने वाली प्रदेश की पहली महिला होने का भी गौरव प्राप्त हैं। सुश्री संतोष ने छह वर्ष की उम्र में एक हादसे के दौरान अपने दोनों हाथ गंवा दिए थे। सोमवारियां गांव मंे पदस्थ शिक्षक बीएल पोटर की प्रेरणा से पैर में पेन फंसाकर लिखने का अभ्यास किया और पांचवीं की परीक्षा अच्छे अंकांे से उत्तीर्ण की। उनकी पैरों से लिखने की गति भी देखते ही बनती है।

बदली जंगल की सूरत (सूरतीबाई)
वन माफिया के कब्जे वाले गुना जिले के हमीरपुर गांव में एक महिला की जागरुकता से न केवल जंगल लहलहा रहे हैं, बल्कि वन संपदा से खासी आय भी हो रही है। यह काम किया सूरतीबाई ने। जंगल बचाने के लिए उन्होंने खुद की वन सेना बना ली। आज यह महिला गांव की नहीं जिले में मौजूद 500 से ज्यादा वन समितियों के महासंघ की अध्यक्ष बन गई है।

समिति अध्यक्ष खीमलीबाई ने बताया कि 2001 में सूरती बाई ने अपने ही गांव की करीब 100 महिलाओं को वन सेना में भर्ती कर जंगल की सुरक्षा का भार अपने ऊपर उठा लिया। इनमें से चार महिलाएं दिन में और चार महिलाएं हाथों में लाठी और हंसिया लेकर रात में जंगल में घूम-घूम कर सुरक्षा करती रहीं। बाद में उनके इस प्रयास में पुरुष भी शामिल हो गए। अब रात में पुरुष और दिन में महिलाएं जंगल की सुरक्षा करती हैं।

बदली गांव की तस्वीर (पुष्पाबाई)
होशंगाबाद की कांद्राखेड़ी ग्राम पंचायत की सरपंच छोटीबाई अमरसिंह रघुवंशी ने तो कमाल ही कर दिया। छोटीबाई मात्र तीसरी कक्षा तक पढ़ी हैं। इन्होंने गांव की महिलाओं को जनपद सदस्य मोहन पटेल के सहयोग एकत्रित कर गांव को साफ-सुथरा बनाने की पहल की। उनकी यह पहल रंग लाई और उन्हें चार मई, 2007 को दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल कलाम ने पुरस्कृत किया।

वहीं प्रदेश सरकार ने सरपंच छोटी बाई और जनपद सदस्य मोहन पटेल को इसके लिए ‘ब्रांड एंबेसडर’ नियुक्त किया। जिला पंचायत के परियोजना अधिकारी अभिनेष रावत बताते हैं कि इन महिला सरपंचों के प्रयासों को देखकर तारारोड़ा, धौखेड़ा, मेहरागांव सहित 140 ग्राम पंचायतों में गांव को स्वच्छ बनाया जा रहा है।(रिपोर्ट: यामिनी रामपल्लीवार, भोपाल/रवि जैन, ब्यावरा/संजीव मेहरा, गुना/आशीष बिल्लौरे, होशंगाबाद)

महिलाओं का वेतन 16 प्रतिशत कम
एजेंसी, नई दिल्ली.

दुनिया में महिलाओं को न केवल समान कार्य के लिए पुरुषों से 16 फीसदी वेतन कम मिलता है, वरन उन्हें पर्याप्त सामाजिक संरक्षण भी उपलब्ध नहीं है। विश्व महिला दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार को जारी हुए अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन तथा इंटरनेशनल ट्रेड यूनियन कन्फेडरेशन की रिपोर्ट में यह तथ्य उजागर हुआ है।

‘महिलाओं के लिए रोजगार का विश्व परिदृश्य मार्च-2008’ नाम की इस रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं को पहले की तुलना में अधिक रोजगार मिला है। लेकिन बेरोजगार होने वाली महिलाओं की संख्या भी बढ़ी है। पुरुषों की तुलना में महिलाओं को कम उत्पादन, कम वेतन तथा असुरक्षित किस्म के काम दिए जाते हैं।

महिलाओं को न तो अब तक सामाजिक संरक्षण मिला है और न ही उन्हें उनके मूल अधिकार दिए गए हैं। महिलाओं की आवाज सुनने की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई है। आईएलओ के महानिदेशक जुआन सोमाविया ने ब्रुसेल्स में रिपोर्ट को जारी करते हुए कहा कि यह विश्व के श्रम बाजारों में महिलाओं की स्थिति में सुधार की ओर इशारा करती है।

अमेरिका में ज्यादा भेदभाव : आयूटीसी के मुताबिक अमेरिका में पुरुषों की तुलना में महिलाओं का वेतन 22.4 प्रतिशत कम है। यह अंतर ब्रिटेन में 20 प्रतिशत, कनाडा में 27.5 प्रतिशत और पैराग्वे में 31.3 प्रतिशत है तथा यूरोप में करीब 14.5 प्रतिशत है।

यहां आगे हैं : कुछ देशों में महिलाओं को पुरुषों से अधिक वेतन मिलता है। मिसाल के लिए बहरीन में महिलाओं को उनके सहयोगी पुरुष कर्मचारियों से 40 प्रतिशत ज्यादा वेतन मिलता है। कतर में भी महिलाओं में 2.2 प्रतिशत अधिक वेतन मिलता है।

सेवा क्षेत्र अग्रणी : आईएलओ की रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराने में पिछले दशक में सेवा क्षेत्र ने कृषि क्षेत्र को पीछे छोड़ दिया है। 2007 में कृषि क्षेत्र में 36.1 प्रतिशत महिलाएं कार्यरत थीं, वहीं सेवा क्षेत्र में उनका प्रतिशत 46.3 था।

पुरुषों की बराबरी कर रही हैं भारतीय महिलाएं
एसोचैम द्वारा शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय महिलाएं पुरुषों को बराबरी की चुनौती दे रही हैं। ज्यादातर भारतीय महिलाएं सप्ताह में 60 घंटे काम करती हैं। रूढ़िवादी विचारधारा के परिवारों में भी महिलाओं को अब पति और सास-ससुर से काम के सिलसिले में देर तक घर से बाहर रहने की अनुमति व सहयोग मिल रहा है।

अब महिलाएं केवल अध्यापन, सिलाई, बुनाई, झूलाघर तक ही सीमित नहीं रह गई हैं। वे उच्च शिक्षा हासिल कर विमानन, इलेक्ट्रॉनिक्स व प्रिंट मीडिया, हॉस्पिटलिटी सेक्टर, बैंकिंग, फायनेंस, रिटेल, आईटी, मेडिकल तथा अन्य क्षेत्रों में भी बढ़-चढ़कर काम कर रही हैं।





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