जीवन दर्शन. मनुष्य की निर्मात्री नारी ही है। बालक की आदि गुरु उसकी माता ही होती है। नारी के पास जो कुछ है वह सब दूसरों के लिए - पति, परिवार और देश के लिए है। मनु भगवान ने स्पष्ट कहा है - जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं। स्त्रियां समाज का निर्माण करती हैं। अत: यदि स्त्रियों की शिक्षा न हुई तो समाज में अशांति का वातावरण फैलना स्वाभाविक है।
यदि मनुष्य जाति उन्नति चाहती है, तो पहले नारी को शारीरिक, बौद्धिक, सामाजिक, आर्थिक सभी दृष्टियों से महत्वपूर्ण और सुविकसित बनाना होगा, तभी मनुष्यों में सबलता, सक्षमता, सद्बुद्धि, सद्गुण और महानता के संस्कारों का उदय हो सकता है। हमारा देश, समाज, जाति तब तक सच्चे अर्थो में विकसित नहीं कहे जा सकते, जब तक नारी को भी नर के समान ही क्रियाशीलता और प्रतिभा प्रकट करने का अवसर न मिले।
पत्नी मनुष्य की अर्धागिनी होती है। कोई यज्ञ अथवा धार्मिक कृत्य उसके बिना सफल नहीं होता। अनेक उदाहरण हैं जिनमें भक्ति और पवित्रता के कारण पत्नी अपने पति की गुरु बन जाती है।
काल के प्रभाव से भारतीय नारी का प्राचीन आदर्श बहुत परिवर्तित हो गया है तो भी प्राचीन संस्कारों के कारण अब भी भारतीय नारी में जो विशेषताएं मिलती हैं, संसार के किसी भी अन्य भाग में मिल सकना असंभव है।
आज भी भारतीय नारी में जितना सतीत्व, श्रद्धा, त्याग का भाव पाया जाता है, उसका उदाहरण किसी भी देश में मिल सकना कठिन है। मानव धर्म का सच्चे अर्थ में केवल वही पालन कर सकती है।
गृहिणी पद के अतिरिक्त प्रकृति ने स्त्री को मातृपद के योग्य भी बनाया है। ‘माता’ शब्द तो पारिवारिक जीवन के लिए अमृत का भंडार है। माता, परिवार के लिए त्याग, तप और प्रेम की त्रिवेणी ही है।
गृहिणी और माता की जिम्मेदारियों से उसका जीवन नीरस न हो जाए और घर के बाहरी झंझटों में फंसकर उसके पति का भी जीवन कटु न हो जाए, इसलिए वह पति की सहचरी बनकर उसे जीवन का आनंद प्रदान करती है।