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समर्पण से ही परमतत्व का ज्ञान

रायपुर. ईदगाह मैदान में जारी प्रवचन आयोजन में शुक्रवार को स्वामी युगलशरण ने कहा कि संसार के वास्तविक स्वरूप का बार-बार चिंतन कर मन को खाली करना होगा। इसके साथ ही विरक्त मन को ईश्वर की ओर ले जाना होगा। वैराग्य के बाद और शरणागति के बीच एक और तत्व है, जिसके बिना काम नहीं हो सकता, वह महापुरुष या गुरु होता है।

स्वामीजी ने कहा कि गीता के मुताबिक भगवान को जानने के लिए क्षत्रिय, ब्राrाण महापुरुष की आवश्यकता है। जिसके प्रति संपूर्ण समर्पित होकर ही परमतत्व का ज्ञान हो सकता है। स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं कि आचार्य, गुरु को न तो मुझसे छोटा मानो, न बड़ा मानो, न बराबर मानो, मैं ही गुरु रूप में खड़ा हूं। जीव जब गुरु के शरणागत होता है तो गुरु उसे शिक्षा देते हैं, साधना का मार्ग बताते हैं।

स्वामीजी ने कहा कि वास्तविक महापुरुष को शास्त्रीय ज्ञान के साथ अनुभवात्मक ज्ञान अर्थात भगवत्कृपा प्राप्त होती है। ऐसा वास्तविक गुरु ही भगवत् प्रेम प्रदान करता है। किंतु वास्तविक गुरु को पहचानना बड़ा कठिन होता है।

स्वामीजी ने कहा कि संसार में चार प्रकार के लोग पाए जाते हैं। इनमें दो महापुरुष और दो साधारण पुरुष हैं। पहले संत वे, जिनकी माया निवृत्त हो गई है और बाहर से भी वे ऐसा ही व्यवहार करते हैं। इन्हें पहचानना सरल है। दूसरे वे जिनकी माया निवृत्ति हो चुकी है लेकिन वे काम, क्रोध, लोभ, मोह की एक्टिंग करते हैं।

ऐसे महापुरुष हमारे भारतीय आध्यात्मिक इतिहास में सबसे ज्यादा हैं और इन्हें पहचानना कठिन है। तीसरे जिनके अंदर से माया निवृत्ति नहीं हुई है और बाहर व्यवहार में भी नहीं। ये हम साधारण मनुष्य हैं। चौथे वे जिनके अंदर से माया निवृत्ति नहीं हुई पर बाहर से वे माया निवृत्ति की एक्टिंग करते हैं। उन्होंने कहा कि आजकल ऐसे ढोंगी लोग ज्यादा हो गए हैं।

योगासन-प्राणायाम 18 तक
हिंद स्पोर्टिग मैदान में स्वामी युगलशरण का प्रवचन 28 फरवरी से शुरू हुआ जो 18 मार्च तक चलेगा। प्रतिदिन प्रवचन शाम 6.30 से रात 8.30 बजे हो रहा है। इसी तरह योगासन-प्राणायाम 18 मार्च तक सुबह 6 से 7 बजे तक तथा माइंड मैनेजमेंट 9 मार्च तक सुबह 7 से 8 बजे तक होगा।





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