बीकानेर.
बांझ होना मतलब औरत की अपूर्णता और जिस वक्त उसे यह पता चलता है कि वह मां नहीं बन सकती, सदमे की स्थिति में अहसास कोई भी करवट ले सकते हैं। कुछ ऐसा ही नजर आया नाटक मरीचिका में।
नायिका को जब पता चलता है कि वह मां नहीं बन सकती तो सदमे से बेहोश हो जाती है और जब होश आता है तो खुद को एक नवजात की मां समझती है। सबको दिखाती है, उसे दूध पिलाती है, नहलाती है, उसके कपड़े धोती है और दुनिया की नजरों से बचाने के लिए काला टीका भी लगाती है। पत्नी की स्थिति को देख पति भी समझौता कर लेता है ताकि शायद पत्नी फिर से ठीक हो सके।
ऐसे में वे परिवार-समाज से दूर एक गांव में जा बसते हैं और कल्पना के बच्चे को कॉलेज तक पहुंचा देते हैं। टाउन हॉल में मंचित इस नाटक की कहानी में तब मोड़ आता है जब एक मनोचिकित्सक नवविवाहित रिश्तेदार दंपती घर में आकर कुछ दिन के लिए ठहरते हैं। वे किशोर बच्चे को तोहफा देना चाहते हैं मगर असलियत उनके सामने आती है कि बच्च तो है ही नहीं।
रिश्तेदार स्थिति में सुधार लाना चाहते हैं मगर मां नहीं मानती और भला-बुरा कहने लगती है। रिश्तेदार तो चले जाते हैं मगर पति भी चाहता है कि पत्नी का इलाज हो। ऐसे में वह बच्चे की बुरी आदतों का जिक्र करता है और एक दिन गुस्से में आकर बच्चे को कैंची से मार देता है।
ऐसे में एक बार फिर पत्नी बेहोश हो जाती है मगर जब उसे होश आता है तो पता चलता है कि उसका पति घर को साफ कर रहा है और पति को अपराध बोध है कि उसने अपने बेटे को मार दिया। अब पत्नी नॉर्मल होकर पति के इलाज में जुट जाती है। टीम ने मनोवैज्ञानिक कथानक को साकार करने के लिए मंच पर कमरे बनाए जिनकी दीवारें नहीं थी। निर्देशन के साथ ही डा.सुनील माथुर अनिश के रूप में मंच पर नजर आए।
अन्य पात्रोंको प्रतिभा कोचर, नीलकमल पारख और अमृता श्रीवास्तव ने जीवंत किया। मंच पर अधिकांश समय जहां दो एवं कुछ देर के लिए चार पात्र रहे, ऐसे में नाटक को गति देने में संगीत, प्रकाश संयोजन, मंच सज्जा जैसे मंचपाश्र्व कार्यो की जिम्मेवारी बढ़ गई। रोहित माथुर, भवानीसिंह चौहान, प्रमोद किशन, यश माथुर ने निभाया।