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जांच का जाल फैलता तो आरोपी फंस जाता

कोटा. कोटा-रावतभाटा के मार्ग पर शाम के वक्त हुई रावतभाटा निवासी भंवर रावत की हत्या के मामले में पुलिस शुरू से ही अंधेरे में तीर चलाए। यदि पुलिस अपना दायरा बढ़ाते हुए जरायम पेशा जातियों पर फोकस रखती तो आज आरोपी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच जाते। भवंर हत्या कांड में वारदात के बाद से ही पुलिस मदद मिलने में लेटलतीफी हुई। घटना की आई विटनेस भवंर की वृद्ध मां भंवरीदेवी थी। वृद्धा मदद के लिए बोराबास पुलिस चौकी पहुंची।

वहां कोई पुलिसकर्मी नहीं मिला तो लिफ्ट लेकर रावतभाटा थाने पहुंची और वारदात की सूचना दी। इसमें दो घंटे का समय लग गया। वहां से पता चला कि मामला दादाबाड़ी थाने का है। तब दादाबाड़ी पुलिस सक्रिय हुई और तब तक वारदात को हुए तीन घंटे से अधिक समय गुजर चुका था। पुलिस ने जांच शुरू कर उस क्षेत्र में सक्रिय गुर्जर गिरोह को तलाशना शुरू किया। पुलिस ने करीब 25 से 30 ऐसे लोगों से पूछताछ की जो उस क्षेत्र में आतंक फैलाकर लूटपाट करते थे लेकिन, इस बार भी पुलिस का तीर निशाने पर नहीं बैठा।

अंत में पुलिस ने दिसंबर माह में एफआर लगाकर फाइल बंद कर दी। अदालत ने एफआर मंजूर नहीं की और पुलिस को मामले की नए सिरे से जांच करने के आदेश दिए। अब पुलिस दुबारा लूट के इरादे से हत्या को दिशा मानकर जांच कर रही है लेकिन, अभी पुलिस का ध्यान संभाग में सक्रिय जरायम पेशा जातियों की तरफ नहीं है।

ऐसे शुरू हुई जांच

पहला- हत्या रंजिशवश की गई। यह बिंदु दो-तीन दिन में ही स्पष्ट हो गया कि उसकी कोई रंजिश नहीं थी। दूसरा- इरादा लूट का था लेकिन, अत्यधिक जोश में लुटेरे होश खो बैठे और युवक की हत्या कर दी।

कहां अटकी जांच

पुलिस के हाथ अभी तक ऐसा कोई सुराग अथवा सबूत नहीं लगा जिससे आरोपियों के गिरोह को नामजद कर सके। पुलिस एक ही दिशा में अटक कर रह गई। पुलिस केवल उन्हीं लोगों से पूछताछ कर रही है जो पूर्व में लूट की वारदातों में लिप्त रहे हैं। उनसे अलग हटकर नए अपराधियों की तरफ पुलिस का ध्यान नहीं गया।

जांच के नए कोण

पुलिस अपनी जांच का दायरा और बढ़ाकर अन्य जरायम पेशा जातियों के गिरोह को भी टटोले। खासतौर से कालबेलिया गिरोह के पटेल, पंचों व मुखबिरों को विश्वास में लेकर बातचीत करें। उन लोगों का पता लगाए जो वारदात के पहले और बाद में उस क्षेत्र में डेरा जमाकर रह रहे थे।





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