दृष्टिकोण. जूलियो रिबेरो आजादी के बाद देश को मिले सक्षम और प्रतिष्ठित पुलिस अधिकारियों में से एक हैं। ऐसे में पुलिस सुधार पर उनकी टिप्पणी गंभीर विचार-विमर्श के योग्य है। उनका कहना था कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा प्रस्तावित राज्य सुरक्षा आयोग (एसएससी)में समाज के प्रतिष्ठित नागरिकों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
इससे पहले राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे में कहा था कि सरकार की योजना राज्य सुरक्षा आयोग की स्थापना की है, जो कि बड़े पैमाने पर पुलिस व्यवस्था में सुधार की पहल करेगा। ‘पुलिस की भी कानून के समक्ष जवाबदेही होनी चाहिए। इसके बाद ही पुलिस व्यवस्था में कोई सुधार किया जा सकता है।’ रिबेरो ने कहा था कि सुशासन के लिए लोगों को एक सामूहिक आंदोलन शुरू करना होगा, तभी विद्यमान तंत्र में वास्तविक बदलाव आ पाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि जब पुलिस कैडर में उच्च पदस्थ अधिकारी ही प्रेरित करने लायक आदर्श नहीं स्थापित कर पा रहे हों, तब निचले स्तर के अधिकारियों को दोष देना पूरी तरह सही नहीं होगा।‘अगर आप अच्छे नेतृत्वकर्ता हैं, तभी आपके नीचे अधीनस्थ लोग कानून के उल्लंघन का दु:साहस नहीं कर पाएंगे।’ उन्होंने कहा कि इस बाबत कानूनी स्थिति किसी भी चुनौती से परे है।
पुलिस सुधार के क्रम में देखें तो गांधीजी की हत्या के षड्यंत्र की जांच करने वाले सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जेएल कपूर ने इस संबंध में कानूनी स्थिति पर विचार करने के बाद कहा भी है, ‘आयोग की नजर में यद्यपि गृहमंत्री पुलिस और प्रशासन के लिए जिम्मेदार हैं और वह इस संबंध में संसद के प्रति जवाबदेह भी हैं, इसके बावजूद उसे पुलिस को उसकी कानूनी शक्तियों, ड्यूटी या विवेचना के संबंध में किसी प्रकार का दिशा-निर्देश देने की शक्ति हासिल नहीं है।’
इस लिहाज से देखें तो प्रशासनिक नियंत्रण राजनीतिक नियंत्रण से पूर्णतया भिन्न है। पुलिस विभाग का मुखिया होने के नाते गृहमंत्री का संवैधानिक दायित्व है कि वह सार्वजनिक प्रशासन और कानून व्यवस्था के क्रम में सुनिश्चित करे कि पुलिस अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करे। लेकिन इस दायरे के परे गृहमंत्री नहीं जा सकता यानी पुलिस को अपनी वैधानिक शक्तियों के प्रयोग के बाबत दिशा-निर्देश नहीं दे सकता। अगर वह ऐसा करता है तो इसे हस्तक्षेप माना जाएगा। ‘कानून के तहत ऐसा होने पर प्रशासनिक निरीक्षण समाप्त माना जाएगा और इसे वैधानिक शक्तियों में हस्तक्षेप की शुरुआत माना जाएगा।’
हालांकि यह एक कड़वी सचाई है कि व्यावहारिक जीवन में कानून का खिलवाड़ ही होता है। केंद्र के साथ-साथ राज्य के पुलिस बल भी सत्ताधारी नेताओं के इशारे पर ही काम करते हैं। यहां तक कि एमपी और एमएलए भी उनके कार्यो में हस्तक्षेप करते हैं। उत्तरप्रदेश में तो सरकार बदलते ही आईजी से लेकर इंस्पेक्टर तक पूरे के पूरे प्रशासनिक महकमे का तबादला हो जाता है। कुछ का तबादला होता है, तो कुछ को सबक सिखाया जाता है। इसका असर पूरे अमले के मनोबल पर पड़ता है।
अब प्रश्न उठता है कि महाराष्ट्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल हलफनामे और प्रस्तावित राज्य सुरक्षा आयोग में है क्या? उत्तरप्रदेश और असम के डीजीपी रहे प्रकाश सिंह द्वारा 22 सितंबर 2006 को दाखिल याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दी गई व्यवस्था से जुड़ा है यह मामला। यह एक विस्तृत याचिका थी, जिसमें पुलिस द्वारा मानवाधिकार उल्लंघन की घटनाओं का सिलसिलेवार ब्योरा दर्ज था। भले ही वे उल्लंघन पक्षपात के जरिए किए गए थे या पुलिस बल तैनात न करके।
याचिका में कहा गया था कि १८६१ का पुलिस एक्ट वर्तमान समय की जरूरतों को पूरा करने में सक्षम नहीं है। इस पर राष्ट्रीय पुलिस आयोग की रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी व्यापक दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया गया था कि सभी राज्य सरकारें राज्य सुरक्षा आयोग का गठन करें जिससे सरकार पुलिस पर अनुचित प्रभाव या दबाव न डाल सकें।
साथ ही राज्य सरकार विस्तृत दिशा-निर्देश भी तैयार करे जिससे राज्य पुलिस बल संविधान और कानून केतहत कार्य कर सके। इस प्रकार के निगरानी तंत्र की अध्यक्षता राज्य के मुख्यमंत्री या गृहमंत्री कर सकते हैं, तो राज्य का डीजीपी सचिव होगा। इस आयोग के सुझाव राज्य सरकार पर बाध्यकारी होंगे।
यह भी व्यवस्था दी गई कि डीजीपी प्रदेश पुलिस बल के तीन वरिष्ठ अधिकारियों में से चुना जाना चाहिए। इस पैनल में शामिल होने वाले अधिकारियों का चयन यूपीएससी द्वारा उनकी सेवा अवधि, अच्छे रिकार्ड और अनुभव के आधार पर किया जाना चाहिए। एक बार इस पद के लिए चुने जाने पर उसकी सेवा की अवधि कम से कम दो वर्ष होनी चाहिए।
इसी तरह के कई और व्यापक दिशा-निर्देश सर्वोच्च न्यायालय ने दिए थे। इनमें पुलिस अधिकारियों के तबादले, प्रमोशन, पोस्टिंग के लिए भी पुलिस इस्टेबलिशमेंट बोर्ड के गठन का प्रस्ताव था। साथ ही, पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शिकायतों समेत जांच और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अलग-अलग व्यवस्था करने को कहा गया था।
जाहिर है पुलिस सुधार के क्रम में यह दिशा-निर्देश स्वागतयोग्य है, लेकिन क्या इस बाबत दिशा-निर्देश जारी करने के लिए न्यायालय सक्षम है या इस बाबत कानून बनाना संसद या विधानसभा का काम है? अदालत पूर्व में दी गई व्यवस्थाओं के आलोक में मानती है कि ‘यह संभव या उचित नहीं है कि इस विषय को यूं ही छोड़ दिया जाए और इस संबंध में सरकार के अगले कदम का इंतजार किया जाए।
जब तक इस क्रम में राज्य सरकार द्वारा कानून नहीं बनाया जाता, इस बाबत दिशा-निर्देश जारी करना आवश्यक है। संविधान के अनुच्छेद ३२ को अनुच्छेद १४२ के साथ मिलाकर पढ़ने से यह स्पष्ट है कि इस प्रकार के दिशा-निर्देश जारी करने के लिए संविधान न्यायालय को सक्षम बनाता है।
हालांकि अदालत द्वारा इस प्रकार के दिशा-निर्देश देने के संबंध में कानून विशेषज्ञों की भी अलग-अलग राय है। १९७१ में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहे केएस हेगड़े ने कहा था कि कोई अदालत किसी कानून को बनाने के लिए विधायिका को आदेश जारी नहीं कर सकती। १९८९ में सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस सिद्धांत की पुष्टि की थी।
हालांकि उस वक्त सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अगर विधायिका कानून बनाने में नाकाम रहती है, तो सुधार के क्रम में अदालत अंतरिम आदेश दे सकती है। बाकी काम विधायिका को ही करना होगा। इस लिहाज से राष्ट्रीय और राज्य सुरक्षा आयोग या पुलिस शिकायत प्राधिकरण का गठन विधायिका ही कर सकती है। ये आयोग सरकारी आदेश से गठित नहीं किए जा सकते।
-लेखक वरिष्ठ कानूनविद हैं।