संपादकीय. देश में मेट्रो रेल के संजाल का विस्तार करने के मद्देनजर केंद्र सरकार ने एक संशोधन विधेयक के जरिये दिल्ली मेट्रो संचालन व रखरखाव अधिनियम 2002 में संशोधन करने का फैसला कर एक बेहद जरूरी पहल की है। हालांकि सरकार ने यह फैसला हरियाणा के गुड़गांव तथा उत्तरप्रदेश के नोएडा इलाकों में दिल्ली मेट्रो का विस्तार करने में आ रही कानूनी बाधाएं दूर करने के लिए किया है, मगर एक बार केंद्रीय कानून बन जाने से देश के दूसरे बड़े और मझौले शहर भी अपनी मेट्रो रेल सेवा का सपना साकार होने की उम्मीद संजो सकेंगे।
हकीकत है कि बीते डेढ़-दो दशकों में तेजी से शहरीकरण होने और बड़े तथा मझौले शहरों के आसपास रहवासी बस्तियों का विशाल संजाल बिछ जाने के अनुपात में परिवहन सुविधाओं का विस्तार नहीं हुआ है। प्राय: हरेक बड़े और मझौले शहर में भीड़-भाड़ के समय यातायात जाम होने या उसके कछुआ चाल से चलने की नौबत आना आम हो गया है।
ज्यादातर शहरों में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली पंगु हो गई है या फिर अस्तित्व में ही नहीं है। मजबूर होकर लोगों को निजी वाहन का बंदोबस्त करना पड़ता है जो खर्चीला होने के साथ ही पर्यावरण के लिए नुकसानदेह भी है। पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों की वजह से भी सीमित आय वालों के लिए निजी वाहनों का इस्तेमाल आर्थिक रूप से कमर तोड़ने वाला साबित हो रहा है।
इन हालात में 20-25 लाख की आबादी वाले हरेक शहर के लिए मेट्रो रेल, मोनो-रेल या स्काई ट्रेन जैसी परिवहन सेवाएं अनिवार्य जरूरत बन गई हैं। सरकार को इनका संजाल खड़ा करने में आने वाली हरेक बाधा दूर करने में किंचित भी नहीं हिचकना चाहिए। कोलकाता और दिल्ली की मेट्रो रेल की सफलता और लोकप्रियता से प्रभावित होकर कुछ राज्य सरकारों ने इस दिशा में काम भी शुरू कर दिया है।
बेंगलूर, चेन्नई और चंडीगढ़ तो दिल्ली मेट्रो की तर्ज पर अपनी-अपनी मेट्रो रेल की योजना बना रहे हैं। आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र की सरकारें क्रमश: हैदराबाद और मुंबई में इस तरह की परिवहन प्रणाली के विकास के लिए निजी निवेश को न्योतने की तैयारी कर रही हैं। केंद्रीय कानून बन जाने से इन तमाम योजनाओं पर अमल को निश्चित रूप से गति मिलेगी और हमारे शहर यातायात के बढ़ते बोझ को ढोने का सामथ्र्य जुटा सकेंगे।