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बायपास और एमआर-10 के बीच धूल का दरिया

इंदौर. एमआर-10 से बायपास तक जाना हो तो धूल का दरिया पार करना होगा। इन्हें जोड़ने वाली सड़क कच्ची है और इतनी उबड़-खाबड़ है कि लोग मजबूरी में उस पर जाते हैं। सड़क पक्की होने में खास परेशानी विकास एजेंसी की है।

बायपास पीडब्ल्यूडी के नेशनल हाईवे डिवीजन (एनएच) ने बनाया है और एमआर-10 इंदौर विकास प्राधिकरण ने। दोनों को जोड़ने वाली कच्ची सड़क पीडब्ल्यूडी के अधीन है। वह इसे पक्का बना दे तो एमआर-10 का समुचित उपयोग शुरू हो जाए। प्राधिकरण भी एमआर-10 का विस्तार बायपास से चार सौ मीटर पहले तक ही कर रहा है क्योंकि पीडब्ल्यूडी (एनएच) ने वहां से लिंक देने से मना कर दिया है।

उसका कहना है बायपास पर थोड़ी-थोड़ी दूर पर लिंक देने से दुर्घटनाओं की आशंका बढ़ती है और यह हाईवे मानकों के भी खिलाफ हैं। ऐसे में एमआर-10 को बायपास के झलारिया सर्कल से जोड़ा जाए। वह सड़क पीडब्ल्यूडी की है और प्राधिकरण कई बार बनाने का आग्रह कर चुका है।

फ्लायओवर भी प्रस्तावित

एमआर-10 को बायपास से जोड़ने की समस्या आने पर प्राधिकरण ने फ्लायओवर बनाना तय किया है ताकि दूसरी ओर प्रस्तावित स्कीम तक पहुंचा जा सके। उसके बनने पर भी एमआर-10 को बायपास से लिंक देना ही होगी।

एमआर-10 का एक हिस्सा ही बना

प्राधिकरण रिंगरोड पर मालवीय पेट्रोल पंप से बायपास तक तीन लेन ही बना रहा है जिसका बड़ा हिस्सा अधूरा पड़ा है। एक्जिक्यूटिव इंजीनियर अनूप ढकेता के मुताबिक उस हिस्से में पाइप लाइन डलना है और सीमेंटेड सड़क खोदने में दिक्कत आती है इसलिए नहीं बनाई। काम कब तक पूरा होगा बताना संभव नहीं।

400 मीटर सड़क की जरूरत

बायपास व एमआर-10 की दूरी महज चार सौ मीटर है लेकिन लिंक नहीं मिलने के कारण वह हिस्सा कच्च पड़ा है। यही सीमेंट-कांक्रीट से बनना है।

तीसरी बार बुलाए टेंडर

पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर पी.सी. अग्रवाल ने बताया झलारिया सर्कल से एमआर-10 तक सड़क के लिए टेंडर बुला लिए हैं। एक्जिक्यूटिव इंजीनियर आर.के. सांवला ने बताया पहले भी दो बार टेंडर बुलाए थे लेकिन दरें अनुमान से बहुत ज्यादा आईं इसलिए तीसरी बार बुलाना पड़े। विभाग का अनुमान है इसे सीमेंट-कांक्रीट से बनाने में करीब 76 लाख रुपए खर्च होंगे।





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