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ईएसआई अस्पताल अटका फाइलों में

रायपुर. राज्य कर्मचारी बीमा अस्पताल दस्तावेजों में 20 साल से चल तो रहा है, लेकिन अब तक इसके लिए भवन नहीं बन सका। इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए जो पैसे केंद्र से मिल रहे हैं, हर साल लैप्स भी हो रहे हैं।

22 साल से प्रस्तावित राज्यस्तरीय कर्मचारी बीमा अस्पताल के लिए केंद्र सरकार 20 साल से बजट दे रही है। तब से यह रकम हर साल लैप्स हो रही है। 2007-08 में अस्पताल शुरू करने के लिए केंद्र ने 70 लाख रुपए दिए थे। इसे अब तक खर्च नहीं किया जा सका। 31 मार्च को यह राशि भी लैप्स होगी और अस्पताल हर साल की तरह इस बार भी फाइलों में गुम हो जाएगा।

अस्पताल के इंफ्रास्ट्रक्चर का ठेका हाल में दिया गया। केंद्र से अस्पताल को जो रकम (70 लाख रुपए) मिली है, उसमें एक्सरे, सोनोग्राफी, पैथालाजी लैब जैसे उपकरण खरीदे जाएंगे। अस्पताल इसी के बाद ही शुरू हो सकेगा। दिलचस्प ये है कि सारी मशीनें और बिस्तर वगैरह 20 साल पहले भी खरीदे जाने थे, लेकिन अब तक ऐसा नहीं हुआ। बीमा अस्पताल का ये हाल है कि सालों से एक ही डाक्टर हैं जो मरीजों को सिर्फ सलाह देकर रवाना कर रहे हैं।

प्रदेशभर में ईएसआई कार्डधारियों की संख्या 60 हजार से अधिक है। अविभाजित मध्यप्रदेश में आठ कर्मचारी बीमा अस्पताल थे। इनमें से एक भी छत्तीसगढ़ के इलाके में नहीं था। उन अस्पतालों में कुछ गंभीर मरीज यहां से जाते थे। छत्तीसगढ़ के लोगों के लिए केंद्र की पहल पर रायपुर के पास 50 बिस्तरों के एक अस्पताल को मंजूरी मिली। 22 साल पहले कुम्हारी के पास अस्पताल भवन का निर्माण शुरू हुआ। यह दो साल में पूरा हुआ। डाक्टरों और स्टाफ के रिक्त पदों पर भर्तियां हुईं, लेकिन धीरे-धीरे यह अस्पताल दुर्दशा का शिकार होने लगा और बंद हो गया।

स्टाफ भी गुम

ईएसआई अस्पताल में डाक्टरों के 54 पद मंजूर हैं। इन पदों पर 25 साल पहले 6 स्पेशलिस्ट डाक्टरों की नियुक्ति हुई थी। इसके अलावा 16 नान स्पेशलिस्ट डाक्टर भी हैं, फिर भी सालों से 22 पद खाली हैं।

क्लीनिक में सिर्फ सलाह

ईएसआई अस्पताल दो कमरों में सिमटा है। रायपुर-दुर्ग जिले में छह डाक्टर इतने की क्लीनिक चला रहे हैं। वहां सिर्फ पर्चियों में सलाह दी जाती है। 50 फीसदी लोगों को भी क्लीनिक से दवा नहीं मिलती।

60 हजार परिवार, 6 डाक्टर

किसी भी क्षेत्र में ईएसआई का अस्पताल शुरू करने के लिए कम से कम 40 हजार कार्डधारियों की संख्या होनी चाहिए। 10 साल पहले ही यह संख्या पार हो गई। अब प्रदेशभर में कुल 60 हजार कार्डधारी हैं, जिनके परिवार के औसतन पांच सदस्यों को मिलाकर तीन लाख लोग हैं। इतने लोगों का इलाज केवल छह डाक्टरों के भरोसे चल रहा है। न तो उन्हें गंभीर इलाज में मदद मिल पाती और न ही सरकार से किसी तरह का फायदा।

अपना पैसा भी बेकार

राज्य कर्मचारी बीमा के कार्डधारियों से सरकार ईएसआई के लिए वेतन से करीब एक प्रतिशत लेती है। किसी के इलाज में राज्य को कुल खर्च का महज 9 प्रतिशत ही वहन करना है। बाकी का खर्च केंद्र उठाने को तैयार है। इसके बावजूद अस्पताल शुरू नहीं हो पा रहा है।





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