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चैंबर ऑफ पॉवर

अजमेर.chamber ज्ञापन देने वालों की भीड़ हो या शहर के लिए कोई प्रोजेक्ट लेकर आया कोई इंडस्ट्रियलिस्ट, सीधा पाला पड़ता है गवर्नमेंट ऑफिसर्स से। अजमेर में अप्वाइंट कई ऑफिसर्स ने इस फैक्ट को बड़ी होशियारी से जज किया और अपने चैंबर्स को मॉडर्न लुक दे डाला। कभी टूटी कुर्सियों, चिप बाए चिप टूटती मेजों और लुगदी होती फाइलों से अपनी पहचान बनाने वाले सरकारी अफसरों के कमरे अब किसी भी कॉरपोरेट हाउस के एमडी या सीइओ के चैंबर को टक्कर देने लगे हैं।

यहां आलपिन की खरोंचों वाली मेज की जगह ग्लास कवर्ड डेस्क है तो डगमगाती कुर्सियों को भी पुश बैक सीट वाले काउच रिप्लेस कर रहे हैं। वजह है कि ‘डेवलपमेंट सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिए’ वाला ट्रेंड। ट्रेंड फॉलो करने में खर्चा जरूर आता है लेकिन यही चैंबर शहर का रुतबा निर्धारित करते हैं।

मेरा चैंबर : कॉरपोरेट स्टाइल

लाइट :यलो लाइट, लिखने पढ़ने के लिए उपयुक्त। दीवारें : व्हाइट और ऑरेंज शेड वाले यलो पार्ट्स में बंटी हुई। चेयर के पीछे गंभीर, फिर भी स्माइल करते गांधीजी की पेंटिंग। डेस्क पर सलीके से रखी फाइलें और कंप्यूटर।

आइडिया : अपनी ट्रेनिंग के दौरान 10 साल पहले नवीन महाजन कुछ वक्त अजमेर में रहे थे। जब वे यहां कलेक्टर बने तो उस चैंबर को वैसा का वैसा पाया। बस फिर क्या था, उसे बेहतर बनवाने में जुट गए। वे मानते हैं कि जहां आप करते हैं, वहां अपनी कुछ छाप छोड़ी जाए। चैंबर के रिनोवेशन को वे आने वाले कलेक्टर्स के लिए अपनी ओर से तोहफा मानते हैं। वे इस तथ्य को भी ईमानदारी से स्वीकारते हैं कि कलेक्टर के चैंबर को बेहतर होना ही चाहिए, फिर उसमें कॉरपोरेट लुक हो तो क्या बात है।

ये किया : चैंबर के रिनोवेशन में करीब 2 लाख रुपए खर्च हुए। महाजन कहते हैं, पिछले साल दिसंबर में हुए रिनोवेशन के वक्त ऑफिशियल वर्क में थोड़ी दिक्कत आई लेकिन बेहतर काम के लिए पैन तो लेना ही होता है।

विकास रिफलैक्ट होता है.. -आशु चौधरी, एसडीएम

मेरा चैंबर : सिंपल विद एस्थेटिक वैल्यूज

पिंक वॉल्स, दरवाजों के पास मैरून कलर से बनाए गए सिंपल पैटर्न।
वॉल्स पर प्रभु गिरधर और रस्टिक अजमेर की पिक्चर्स, यानी सिंपलिसिटी पर जोर।
डार्क ब्लू कर्टेन, जो पिंक दीवारों की लाइटनेस बैलेंस कर देते हैं।
चकाचक डेस्क पर रखा लैपटॉप और बगल में फाइलें।

जैसा चैंबर, वैसा ऑफिसर : ‘मेरा चैंबर छह साल पहले रिनोवेट होना शुरू हुआ था, एसडीएम मुग्धा सिन्हा के वक्त में’, कहतीं हैं आशु चौधरी। फिर कई ऑफिसर्स ने अपने तरीकों से इसपर काम किया। आशु मानती हैं कि कोई भी चैंबर हो उसमें काम करने वाले ऑफिसर की सोच से ही जीवंत लगता है। वे यहां आकर रिलेक्स फील करती हैं, इसीलिए उन्होंने चैंबर का सिटिंग अरेंजमेंट भी चेंज करवाया है।

जो आए, इंप्रेस हो जाए : ‘चैंबर में आना वाले हर व्यक्ति पर उसका साइकोलॉजिकल असर तो होता ही है, सीधे शब्दों में चैंबर खूबसूरत है इंप्रेसिव भी है’, आशु का मानना है। ‘गवर्नमेंट ऑफिसर्स के चैंबर कैसे दिखते हैं, ये रिफलैक्ट करता है कि शहर में विकास की क्या स्थिति है’, वे जोड़ती हैं।





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