लखनऊ. किसी दुर्घटना में या गले का कैंसर जैसी बीमारी होने पर अपनी आवाज गवां देने वाले मरीज अब फिर सामान्य रुप से बोल सकेंगे।
संजय गांधी स्नातकोत्तर अनुसंधान संस्थान ने ऐसे लोगों के लिए कृत्रिम स्वर प्रत्यारोपण लेकर आया है। यह यंत्र वैसे ही काम करेगा जैसे स्वर यंत्र काम करता है।
गले का कैंसर होने पर सबसे पहला प्रभाव मरीज की आवाज पर पड़ता है। यही नहीं अक्सर दुर्घटना में भी लोग अपनी आवाज खो बैठते हैं। कैंसर को बढ़ने से बचाने के लिए अधिकतर मामलों में पहली प्रक्रिया में स्वर यंत्र को निकालना जरूरी हो जाता है।
पीजीआई के न्यूरोआटोलॉजी विभाग के डा. ईषा त्यागी बताते है गले का कैंसर होने पर मरीज की आवाज में परिवर्तन, आवाज का बदल जाना, खाना खाने या थूक निगलने में रुकावट, सांस लेते समय आवाज आना और सांस लेते समय रुकावट के लक्षण महसूस होते हैं।
लिहाजा सबसे पहले कैंसर या दुर्घटना में स्वर यंत्र निकाल देते हैं। इससे मरीज की आवाज चली जाती है। थोड़ा-बहुत बोल पाने के लिए पहले इलेक्ट्रानिक डिवाइस लगानी पड़ती थी लेकिन इस टार्चनुमा डिवाइस से बोलने के लिये बाहर से दबाना पड़ता था। यह बैटरी चालित था यही नहीं इससे स्पष्ट स्वर भी नहीं निकलता था।
लेकिन अब कृत्रिम तौर से सिलेकान से बने यंत्र आ गये हैं। इन्हें गले के स्वर यंत्र के स्थान पर प्रत्यारोपित कर दिया जाएगा। यह स्वर यंत्र की ही भूमिका निभायेगा। इसकी खासियत यह है कि इसमें मरीज की आवाज पूहले की तरह होगी। डॉ त्यागी ने बताया कृत्रिम स्वर प्रत्यारोपण का खर्च 18,000 तक आयेगा लेकिन यह स्वर यंत्र का कारगर उपाय है।