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पारिवारिक हिंसा थमने के बाद ही सुदृढ़ होगा समाज

आज भारतीय अर्थव्यवस्था न सिर्फ तेजी से बढ़ रही है, बल्कि विश्व की कई अर्थव्यवस्थाओं के सामने लगातार सुदृढ़ भी हो रही है। उसके इस महत्वपूर्ण सफर में समाज की सबसे छोटी इकाई यानी परिवार की महत्ता को कम करके नहीं आंका जा सकता है। पारिवारिक सुदृढ़ता ही समाज और फिर शक्तिशाली राष्ट्र की असली कसौटी होती है।

इसके बावजूद परिवार की महत्वपूर्ण धुरी घर की महिला को अभी सुदृढ़ता या दूसरे शब्दों में सशक्तीकरण की वास्तविक मंजिल पाना शेष है। पिछले दिनों महिला दिवस के मौके पर विभिन्न क्षेत्रों की सफल दिग्गज महिलाओं की उपलब्धियों का खूब बखान हुआ, लेकिन किसी ने भी उन महिलाओं की तरफ गंभीरता से प्रकाश डालने की आवश्यकता नहीं समझी, जो पारिवारिक हिंसा का शिकार हैं। सही है कि आज विभिन्न क्षेत्रों में महिलाएं महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रही हैं।

अगर आज उसे सामाजिक-राजनीतिक स्तर पर बराबरी का दर्जा दिया जा रहा है, तो इसके लिए उसने एक लंबा संघर्षपूर्ण सफर भी तय किया है। पितृसत्तात्मक समाज में तमाम रुकावटों को पार करते हुए अपनी नेतृत्व क्षमता को स्थापित करने में सफलता हासिल की है। आज की अर्थव्यवस्था उसे अनेक क्षेत्रों में काम के मौके उपलब्ध करा रही है। वह मीडिया, मनोरंजन, आईटी, रिटेल आदि में न सिर्फ भाग ले रही हैं, बल्कि अपना परचम भी फहरा रही है। उसे ग्रामीण से लेकर शहरी प्रशासन में भागीदारी का मौका मिल रहा है। चुनाव से लेकर शासन-प्रशासन और पंचायतों के स्तर पर यह बदलाव स्पष्ट देखने मिल रहा है।

लेकिन इसका यह मतलब नहीं लगाना चाहिए कि सभी महिलाएं सशक्त हो गई हैं। उसके द्वारा हासिल तमाम उपलब्धियों के बावजूद एक वास्तविकता यह भी है कि आज की महिला पारिवारिक हिंसा का शिकार हो रही है। महिला सशक्तीकरण के तमाम बड़े-बड़े दावों और घोषणाओं के बावजूद पारिवारिक हिंसा के मामलों में मामूली कमी ही आई है। इस दिशा में सार्थक और प्रभावी पहल करने की जरूरत है, क्योंकि परिवार से ही समाज और फिर राष्ट्र का निर्माण होता है।

परिवार जैसी सशक्त व्यवस्था जहां हर किसी को प्यार -दुलार, सम्मान और सुरक्षा मिलती है, उसी परिवार को हिंसा के जरिए समाप्त किया जा रहा है। अगर हमारे देश के समाज की व्यवस्था का मूल यानी परिवार ही टूटने लगेगा, तो सहज कल्पना की जा सकती है कि कल का परिदृश्य कैसा होगा। इसलिए जरूरी है कि हर व्यक्ति पहला प्रयास परिवार को हिंसा मुक्त बनाने में करे। साथ ही सुनिश्चित करे कि स्त्रियों को किसी भी तरह की मानसिक, शारीरिक या आर्थिक हिंसा का शिकार न होना पड़े।

महिलाओं पर हिंसा के बढ़ते मामलों के अलावा तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के दौर में एक बड़ी चिंता कन्याभ्रूण हत्या भी है। पुत्र की चाह में तमाम लोगों द्वारा उठाया जा रहा यह कदम मानव जाति के विनाश के रूप में ही परिभाषित होगा। इसलिए खासतौर से पढ़े-लिखे और संपन्न तबकों के बीच यह जो मानसिकता पनप रही है उस पर लगाम लगाने की जरूरत है। कन्याभ्रूण हत्या न सिर्फ गंभीर अपराध है बल्कि यह समग्र मानव जाति के प्रति हिंसा का एक घिनौना रूप भी है। स्त्री-पुरुष अनुपात इसी कारण कम होता जा रहा है। जहां 1991 की जनगणना के मुताबिक प्रति 1000 पुरुष पर 941 स्त्री थीं। वहीं 2001 की जनगणना में प्रति 1000 के मुकाबले घट कर 927 रह गई। दिल्ली जैसे शहर में यह अनुपात 1000 के मुकाबले 868 है, तो पंजाब में और भी बुरा हाल है।

कन्याभ्रूण हत्या के कई कारणों में से एक प्रमुख कारण है अशिक्षा। इस क्षेत्र में भी बालिकाओं को शिक्षित करने पर खासा जोर देना होगा, क्योंकि आगे की सभी लड़ाइयों और चुनौतियों का सामना करने की पहली शर्त उसका सशक्तीकरण है जो शिक्षा के बिना संभव नहीं है। आंकड़े दर्शाते हैं कि देश में अभी भी लगभग 7-14 साल की बीस फीसदी बालिकाएं स्कूल में औपचारिक शिक्षा के लिए नहीं जा रही हैं। जब तक वह शिक्षित नहीं होगी तब तक अपने अधिकारों को नहीं जान पाएगी। इस क्रम में भी सबसे बड़ी चुनौती सशक्तीकरण के माहौल को शहरों से गांवों तक पहुंचाना भी है। बदलाव के इस माहौल में भारतीय महिला को स्वयं अपनी रक्षा करनी होगी। उसे अपनी मानसिकता और सोच को सबल एवं सशक्त बनाने की जरूरत है।

इसके अतिरिक्त आज भी पुरुषों के एक बड़े वर्ग को महिला को सम्मान देना नहीं आया है। उन्हें केवल उसकी आमदनी से ही मतलब है। कमाई के मामले में भी पुरुषों से आगे निकल रही महिला के कारण स्त्री-पुरुष के सबंधों में तनाव बढ़ा है। आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए, क्योंकि आज की महिलाएं एक साथ कई मोर्चो पर अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। उसकी इन सभी के पीछे एक ही कोशिश है कि उसका परिवार खुश रहे। ऐसे में महिला के प्रति सम्मान दर्शाने की महती जरूरत है। यह सम्मान एक पुरुष उसे प्यार के साथ एक कप चाय पिलाकर भी दर्शा सकता है।

-लेखिका सेंटर फॉर सोशल रिसर्च में डायरेक्टर हैं।





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